
नई दिल्ली में आयोजित ‘वर्तमान समय में शास्त्रार्थ’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी में दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता ने भारतीय ज्ञान परंपरा, लोकतंत्र और संवाद की संस्कृति पर विस्तार से अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन शास्त्रार्थ परंपरा केवल अतीत की विरासत नहीं है, बल्कि वर्तमान समय में भी इसकी उतनी ही आवश्यकता है। उनके अनुसार जब समाज में संवाद, तर्क और विचार-विमर्श की परंपरा मजबूत होती है, तब लोकतंत्र भी अधिक सशक्त बनता है और समाज में सकारात्मक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त होता है।
शास्त्रार्थ भारतीय ज्ञान परंपरा की आत्मा है
अपने संबोधन में विजेन्द्र गुप्ता ने कहा कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि यहां विचारों को कभी किसी पर थोपा नहीं गया। भारत में हमेशा संवाद, चर्चा और तर्क के माध्यम से सत्य को खोजने का प्रयास किया गया। उन्होंने कहा कि शास्त्रार्थ भारतीय ज्ञान परंपरा की आत्मा है, क्योंकि इसके माध्यम से विभिन्न विचारों का आदान-प्रदान होता है और सत्य तक पहुंचने का मार्ग खुलता है। उन्होंने बताया कि भारत के प्राचीन ग्रंथों, उपनिषदों और दार्शनिक परंपराओं में संवाद को विशेष महत्व दिया गया है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में ज्ञान प्राप्ति का आधार चर्चा और विचार-विमर्श रहा है।
आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के शास्त्रार्थ का किया उल्लेख
विजेन्द्र गुप्ता ने अपने भाषण में भारत के प्रसिद्ध दार्शनिक शास्त्रार्थों का भी उल्लेख किया। उन्होंने विशेष रूप से आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच हुए ऐतिहासिक शास्त्रार्थ की चर्चा करते हुए कहा कि यह केवल दो विद्वानों के बीच बहस नहीं थी, बल्कि सत्य की खोज का एक महान प्रयास था। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में किसी को हराना या नीचा दिखाना उद्देश्य नहीं होता था, बल्कि सही विचार और सत्य की स्थापना को महत्व दिया जाता था। यही कारण है कि भारतीय शास्त्रार्थ दुनिया की अन्य बहसों से अलग और विशिष्ट रहे हैं।
संवाद से ही होता है सत्य का बोध
विजेन्द्र गुप्ता ने कहा कि भारतीय दर्शन का प्रसिद्ध सिद्धांत “वादे-वादे जायते तत्त्वबोधः” आज भी उतना ही प्रासंगिक है। इसका अर्थ है कि लगातार संवाद और विचार-विमर्श के माध्यम से ही सत्य का ज्ञान प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि जब विभिन्न विचारों वाले लोग एक-दूसरे को सुनते हैं, अपने तर्क रखते हैं और खुले मन से चर्चा करते हैं, तब समाज में बेहतर समझ विकसित होती है। यही प्रक्रिया लोकतंत्र को मजबूत बनाती है और लोगों के बीच विश्वास बढ़ाती है।
आधुनिक समय में संवाद की संस्कृति कमजोर पड़ रही है
विजेन्द्र गुप्ता ने वर्तमान समय की चुनौतियों पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज का युग सूचना और तकनीक का युग है। लोगों के पास पहले की तुलना में कहीं अधिक जानकारी उपलब्ध है, लेकिन इसके बावजूद धैर्यपूर्वक सुनने और विचारों को समझने की संस्कृति कमजोर होती दिखाई दे रही है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को अपनी बात रखने का मंच दिया है, जो एक सकारात्मक बात है। लेकिन इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि लोग दूसरों की बातों को सुनें, समझें और सम्मान दें। यदि केवल अपनी बात कहने की प्रवृत्ति बढ़ेगी और सुनने की संस्कृति कमजोर होगी, तो समाज में संवाद की जगह टकराव बढ़ सकता है।
लोकतंत्र का आधुनिक स्वरूप है शास्त्रार्थ
विजेन्द्र गुप्ता ने कहा कि आज के लोकतांत्रिक संस्थान, विशेष रूप से विधानसभाएं और संसद, प्राचीन शास्त्रार्थ परंपरा का आधुनिक रूप हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतकर सरकार बनाने का नाम नहीं है। उनके अनुसार लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति तब दिखाई देती है जब विभिन्न विचारों, मतों और दृष्टिकोणों को सदन में अपनी बात रखने का अवसर मिलता है। चर्चा और बहस के माध्यम से ही बेहतर नीतियां बनती हैं और जनहित में निर्णय लिए जाते हैं। उन्होंने कहा कि स्वस्थ बहस और सार्थक संवाद से उत्पन्न विचार-मंथन शासन व्यवस्था को अधिक प्रभावी और जनोन्मुख बनाता है।
शास्त्रार्थ का उद्देश्य किसी को हराना नहीं, सत्य तक पहुंचना है
अपने संबोधन में विजेन्द्र गुप्ता ने स्पष्ट किया कि शास्त्रार्थ और सामान्य विवाद में बहुत बड़ा अंतर है। सामान्य विवाद का उद्देश्य अक्सर किसी को गलत साबित करना या स्वयं को सही सिद्ध करना होता है, जबकि शास्त्रार्थ का उद्देश्य सत्य की खोज करना होता है। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में उदारता, निष्पक्षता और खुले विचारों को हमेशा महत्व दिया गया है। यही मूल्य शास्त्रार्थ की आधारशिला हैं। जब लोग पूर्वाग्रह छोड़कर विचार-विमर्श करते हैं, तभी समाज को सही दिशा मिलती है।
भारती की निष्पक्षता का दिया उदाहरण
विजेन्द्र गुप्ता ने मंडन मिश्र और आदि शंकराचार्य के प्रसिद्ध शास्त्रार्थ का उल्लेख करते हुए भारती की निष्पक्ष भूमिका की भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि भारती ने निर्णायक के रूप में पूरी निष्पक्षता और ईमानदारी का परिचय दिया था। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में निष्पक्षता और न्याय को हमेशा सर्वोच्च स्थान दिया गया है। यही मूल्य आज के लोकतांत्रिक समाज के लिए भी अत्यंत आवश्यक हैं।
भारतीय संस्कृति के मूल मूल्य आज भी प्रासंगिक
विजेन्द्र गुप्ता ने कहा कि आत्मसंयम, त्याग, करुणा, सहिष्णुता और संवाद जैसे मूल्य भारतीय संस्कृति की पहचान हैं। ये मूल्य केवल अतीत की धरोहर नहीं हैं, बल्कि आज की सामाजिक और वैश्विक चुनौतियों का समाधान भी प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने कहा कि यदि समाज इन मूल्यों को अपनाए तो अनेक समस्याओं का समाधान सहज रूप से संभव हो सकता है। संवाद और सहमति की संस्कृति समाज को अधिक मजबूत और समरस बनाती है।
शास्त्रार्थ की परंपरा को पुनर्जीवित करने का आह्वान
संगोष्ठी के समापन की ओर बढ़ते हुए विजेन्द्र गुप्ता ने भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद और भारत बोध केंद्र को इस महत्वपूर्ण आयोजन के लिए बधाई दी। उन्होंने विश्वास जताया कि इस दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी से ऐसे महत्वपूर्ण सुझाव सामने आएंगे, जो आधुनिक समय में शास्त्रार्थ की परंपरा को पुनर्जीवित करने में सहायक सिद्ध होंगे। उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की मांग है। इसके माध्यम से एक आत्मविश्वासी, जागरूक और मूल्यनिष्ठ समाज का निर्माण किया जा सकता है।
संवाद ही हर समस्या का समाधान
अपने संबोधन के अंत में विजेन्द्र गुप्ता ने कहा कि समाज, लोकतंत्र और राष्ट्र के सामने आने वाली अधिकांश समस्याओं का समाधान संवाद के माध्यम से ही निकाला जा सकता है। उन्होंने युवाओं, शिक्षाविदों, विद्वानों और आम नागरिकों से अपील की कि वे ऐसी संवाद संस्कृति को बढ़ावा दें जिसमें मतभेद तो हों, लेकिन मनभेद न हों। उन्होंने कहा कि जब लोग सम्मानपूर्वक एक-दूसरे की बात सुनते हैं, विचारों का आदान-प्रदान करते हैं और सत्य की खोज के लिए मिलकर प्रयास करते हैं, तभी एक मजबूत लोकतंत्र और समरस समाज का निर्माण संभव होता है। उनके अनुसार शास्त्रार्थ की यही परंपरा भारत की सबसे बड़ी बौद्धिक शक्ति है और इसे पुनर्जीवित करना आज की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।