21 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट में वक्फ संशोधन कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अपना पक्ष रखा।सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश भूषण रामाकृष्ण गवई और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ के सामने दलील दी कि वक्फइस्लाम की अवधारणा जरूर है, लेकिन इसे अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं माना जा सकता।
चैरिटी सभी धर्मों में, लेकिन अनिवार्य नहीं
तुषार मेहता ने कहा कि दान या चैरिटी का विचार हर धर्म में पाया जाता है—चाहे वह ईसाई धर्म हो, हिंदू धर्म या सिख धर्म। लेकिन सुप्रीम कोर्ट कीपूर्वव्याख्याओं के अनुसार, यह किसी भी धर्म के लिए बाध्यकारी नहीं है। इसी प्रकार, वक्फ भी इस्लाम का हिस्सा होते हुए भी अनिवार्य धार्मिक प्रथानहीं माना जा सकता।
क्या वक्फ न करने वाला मुसलमान नहीं होता?
एसजी मेहता ने सवाल उठाते हुए कहा कि यदि किसी मुसलमान की आर्थिक स्थिति ऐसी है कि वह वक्फ नहीं कर सकता, तो क्या उसे मुसलमान नहींमाना जाएगा? उन्होंने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट का यह मानक तय करने का तरीका है कि कोई परंपरा आवश्यक धार्मिक प्रथा है या नहीं।
वक्फ कानून से जुड़े अधिकार मौलिक नहीं
केंद्र सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि वक्फ से संबंधित अधिकार मौलिक अधिकार नहीं हैं। यह अधिकार कानून के तहत 1954 में मान्यताप्राप्त हुए थे और उससे पहले बंगाल एक्ट में भी वक्फ का प्रावधान था। तुषार मेहता ने कहा कि यदि कोई अधिकार केवल कानून द्वारा दिया गया है, तो राज्य उसे वापस लेने का भी अधिकार रखता है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकीलों ने रखी थी दलीलें
इससे एक दिन पहले, 20 मई को याचिकाकर्ताओं की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी और राजीव धवन ने दलील दीथी कि नया वक्फ कानून संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लंघन करता है, जो धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं।