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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा दीघा में बनवाए गए नए जगन्नाथ मंदिर को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। ओडिशा के लोगोंऔर पुरी के जगन्नाथ मंदिर से जुड़े सेवायतों का कहना है कि “जगन्नाथ धाम” सिर्फ पुरी में है, और उसे कहीं और दोहराना न केवल गलत है, बल्किउनकी धार्मिक भावनाओं का भी अपमान है।
दीघा का नया मंदिर – क्या है इसकी खासियत?
बंगाल सरकार ने समुद्र तट के मशहूर पर्यटन स्थल दीघा में करीब 250 करोड़ रुपये की लागत से इस भव्य मंदिर का निर्माण करवाया है। मंदिर पुरी केप्रसिद्ध श्रीजगन्नाथ मंदिर की शैली पर आधारित है। इसका उद्घाटन 30 अप्रैल 2025 को अक्षय तृतीया के दिन हुआ। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसेराज्य में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने वाला कदम बताया है। उनका कहना है कि अब बंगाल के श्रद्धालुओं को भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिएओडिशा नहीं जाना पड़ेगा।

क्यों है ओडिशा में नाराज़गी?
ओडिशा के लोगों को सबसे बड़ी आपत्ति इस बात से है कि इस मंदिर को भी “जगन्नाथ धाम” कहा जा रहा है। उनके अनुसार, “जगन्नाथ धाम” कोईसामान्य मंदिर नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा और हजारों वर्षों की आस्था का केंद्र है। पुरी का मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्किउसकी रथ यात्रा, महाप्रसाद और सेवायतों की भूमिका भी विशिष्ट और पवित्र मानी जाती है।

पुरी के सेवायतों ने साफ कहा है कि वे दीघा में बने इस मंदिर को मान्यता नहीं देते और किसी भी सेवक को वहां पूजा-पाठ करने से मना किया गया है।

राजनीति भी हो रही है गरम
भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ने इस मुद्दे को लेकर तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार धर्मका राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश कर रही है। शुभेंदु ने सवाल उठाया कि सरकारी पैसे से मंदिर बनाना संविधान के खिलाफ है, और साथ हीपुरी की परंपरा की नकल करने की भी आलोचना की।

ममता बनर्जी की सफाई
ममता बनर्जी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि दीघा का मंदिर पुरी के मंदिर की नकल नहीं, बल्कि एक श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक है।उन्होंने कहा कि यहां की परंपराएं पुरी से अलग होंगी—जैसे कि यहां प्रसाद में गुजिया और पेड़ा चढ़ेगा, न कि खाजा। उन्होंने मंदिर को “धार्मिक औरसांस्कृतिक परियोजना” बताया और यह भी स्पष्ट किया कि इसकी देखरेख के लिए एक समिति बनाई गई है, जिसमें इस्कॉन के वरिष्ठ सदस्य भीशामिल हैं।

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