नेहरू और पटेल ने हिंदू महासभा और RSS की गतिविधियों की की कड़ी आलोचना, जयराम रमेश ने साझा किया

शुक्रवार को महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के मौके पर कांग्रेस के राज्यसभा सांसद और मीडिया प्रभारी जयराम रमेश ने वर्ष 1948 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लिखे गए जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल के दो पत्र सार्वजनिक किए। इन दोनों ही पत्रों में दोनों दिग्गज नेताओं ने हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की गतिविधियों की कड़ी आलोचना की गई थी। जवाहरलाल नेहरू के संबोधन का लिंक भी शेयर कियादोनों नेताओं के पत्र को सार्वजनिक करते हुए जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, ‘महात्मा गांधी की हत्या से दो दिन पहले जवाहरलाल नेहरू ने मुखर्जी को पत्र लिखा था, जबकि कुछ महीने बाद 18 जुलाई 1948 को सरदार पटेल ने भी उन्हें पत्र भेजा था। दोनों पत्रों में स्वयं को राष्ट्रवाद का संरक्षक बताने वालों के खिलाफ गंभीर आरोप लगाया गया था। इस दौरान जयराम रमेश ने 30 जनवरी 1948 की रात महात्मा गांधी की हत्या के बाद ऑल इंडिया रेडियो पर दिए गए जवाहरलाल नेहरू के संबोधन का लिंक भी शेयर किया। महासभा की गतिविधियों की आलोचना कीजयराम रमेश ने अपने पोस्ट में यह लिखा कि नेहरू ने मुखर्जी को लिखे पत्र में आरोप लगाया था कि हिंदू महासभा ने पुणे, अहमदनगर और दिल्ली में प्रतिबंध आदेशों की अवहेलना करते हुए बैठकें की थीं। इन बैठकों के दौरान कुछ भाषणों में महात्मा गांधी को ‘देश के लिए बाधा’ बताया गया और उनके शीघ्र निधन की बात कही गई थी। इसके साथ ही पूर्व प्रधानमंत्री ने अपने पत्र में आरएसएस की गतिविधियों को और भी अधिक आपत्तिजनक बताया और कहा कि सरकार के पास संगठन से जुड़ी गंभीर जानकारी उपलब्ध है। इसके अलावा रमेश ने सरदार पटेल के पत्र का एक स्क्रीनशॉट भी साझा किया, जिसमें उन्होंने आरएसएस और हिंदू महासभा की गतिविधियों की आलोचना की थी।
“सरना अलग धर्म नहीं, पूजा का एक रूप मोहन भागवत ने आदिवासियों को बताया जल-जंगल-जमीन का असली ट्रस्टी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि भारतीय परंपरा और धर्म हमें विविधता में एकता सिखाते हैं। रास्ते अलग हो सकते हैं लेकिन मंजिल एक ही है। भारतीय धर्म हमें सिखाता है कि सभी अलग-अलग रास्ते सही हैं और उनमें से कोई भी गलत नहीं है। यही सनातन, हिंदू और भारतीय धर्म है। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म किसी खास पूजा पद्धति का नाम नहीं है, बल्कि यह एक साथ रहने का तरीका है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने शनिवार को यहां आदिवासी समूहों के साथ बंद कमरे में बातचीत की और विविधता में एकता के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कार्यक्रम के दौरान आदिवासी समूहों के प्रतिनिधियों के उठाए गए विभिन्न मुद्दों को सुना। इनमें धार्मिक धर्मांतरण, पीईएसए नियमों में कथित खामियां और डीलिस्टिंग शामिल हैं। संघ ने भागवत के हवाले से एक बयान में कहा कि भारत की पहचान विविधता में एकता में निहित है। पूजा के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन मूल सभ्यतागत मूल्य समान रहते हैं। दशकों के अनुभव और चिंतन के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि समाज को सामूहिक रूप से काम करना चाहिए, क्योंकि सभी विविधताओं के बावजूद हम मूल रूप से एक हैं। विविधताओं को स्वीकार करने का जीवन-दर्शनभागवत ने समझाया कि हिंदू शब्द बाद में आया लेकिन इसका सार जल (पानी), जंगल (वन) और खेती (कृषि) में निहित है। उन्होंने कहा कि वेद और उपनिषद का दर्शन प्रकृति के साथ इसी रिश्ते से पैदा हुआ है तथा अथर्ववेद में विविधता के प्रति सम्मान के विचार झलकते हैं, जहां धरती मां सभी जीवों का पालन-पोषण करती हैं और सभी भाषाओं का सम्मान किया जाता है। आदिवासी मुद्दों पर बात करते हुए भागवत ने कहा कि आदिवासी समाज की समस्याएं पूरे देश की समस्याएं हैं। उन्होंने कहा कि सरना पूजा का एक रूप है, कोई अलग धर्म नहीं। उन्होंने कहा कि वनवासी समुदाय जंगलों और जमीन के ट्रस्टी के तौर पर काम करते हैं तथा उनकी सहमति, भागीदारी और जवाबदेही जरूरी है। रांची में आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों से संवाद के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने हिंदू धर्म की अवधारणा पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म किसी एक पूजा पद्धति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह साथ-साथ रहने और विविधताओं को स्वीकार करने का जीवन-दर्शन है, जो भारतीय परंपरा की मूल पहचान को दर्शाता है।
मोहन भागवत का बयान धर्म ही भारत का चालक, यही बनाएगा देश को विश्वगुरु

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने रविवार को कहा कि जब तक धर्म भारत का मार्गदर्शन करता रहेगा, देश विश्वगुरु बना रहेगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत के पास जो आध्यात्मिक ज्ञान है, वह दुनिया में कहीं और उपलब्ध नहीं है, क्योंकि अन्य जगहों पर आध्यात्मिकता की कमी है। एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि धर्म पूरे ब्रह्मांड का चालक है और सृष्टि का हर काम इसी सिद्धांत पर चलता है। उन्होंने कहा कि भारत को अपने पूर्वजों, संतों और ऋषियों से एक समृद्ध आध्यात्मिक विरासत मिली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उदाहरण देते हुए संघ प्रमुख ने कहा, “चाहे वह नरेंद्र भाई हों, मैं हूं, आप हों या कोई और, हम सभी को चलाने वाली एक ही शक्ति है। अगर गाड़ी उस शक्ति से चलाई जाती है, तो कभी कोई दुर्घटना नहीं होगी। वह चालक धर्म ही है।” प्रयासों से इन कानूनों को समझाउन्होंने आगे कहा, धर्म पूरे ब्रह्मांड का चालक है। जब सृष्टि अस्तित्व में आई, तो उसके कामकाज को नियंत्रित करने वाले नियम धर्म बन गए। सब कुछ उसी सिद्धांत पर चलता है।भागवत ने कहा धर्म सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं है। प्रकृति में हर चीज का अपना अंतर्निहित कर्तव्य और अनुशासन होता है। उन्होंने कहा, “पानी का धर्म बहना है, आग का धर्म जलना है। इसी तरह बेटे का कर्तव्य है, शासक का कर्तव्य है और आचरण के नियम हैं। हमारे पूर्वजों ने गहन आध्यात्मिक शोध और प्रयासों से इन कानूनों को समझा था।” वैश्विक पहचान का आधारउन्होंने यह भी राय व्यक्त की कि एक राज्य या व्यवस्था धर्मनिरपेक्ष हो सकती है, लेकिन कोई भी इंसान या रचना धर्म के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकती। उन्होंने कहा कि भारत के सामान्य जनमानस में धर्म गहरा समाया हुआ है। “झोपड़ी में रहने वाला व्यक्ति शायद भाषण न दे पाए, लेकिन धर्म उसकी रगों में बहता है।”आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए धर्म को ब्रह्मांड का चालक बताया। उन्होंने कहा भारत की आध्यात्मिक विरासत अद्वितीय है और यही उसकी वैश्विक पहचान का आधार है। जब तक धर्म भारत का मार्गदर्शन करता रहेगा, देश विश्वगुरु बना रहेगा।