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सोमनाथ से पीएम मोदी का संदेश आक्रांताओं के नाम मिट गए, लेकिन आस्था और स्वाभिमान अमर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमनाथ मंदिर पहुंचकर न केवल पूजा-अर्चना की, बल्कि देश के इतिहास, आस्था और आत्मसम्मान से जुड़ा एक सशक्त संदेश भी दिया। सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के अवसर पर पीएम मोदी ने कहा कि सोमनाथ को तोड़ने वाले आक्रांता आज इतिहास के पन्नों में सिमट गए हैं, लेकिन दुर्भाग्य से देश में आज भी ऐसी ताकतें मौजूद हैं, जो मंदिरों के पुनर्निर्माण का विरोध करती रही हैं। पीएम मोदी ने देशभर से जुड़े श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा आज देश के कोने-कोने से लाखों लोग हमारे साथ जुड़े हैं। ये समय अद्भुत है, ये वातावरण अद्भुत है। एक ओर महादेव, दूसरी ओर समुद्र की लहरें, मंत्रों की गूंज और भक्तों की उपस्थिति यह सब इस अवसर को दिव्य बना रहा है। प्रधानमंत्री ने कहा कि वे इसे अपना सौभाग्य मानते हैं कि उन्हें सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष के रूप में इस ऐतिहासिक पर्व में सेवा का अवसर मिला। आक्रांता आते रहेपीएम मोदी ने कहा कि जब वे आज यहां खड़े होकर बोल रहे हैं, तो उनके मन में यह सवाल बार-बार आता है कि 1000 साल पहले इसी स्थान पर कैसा माहौल रहा होगा। उन्होंने कहा हमारे पुरखों ने अपनी आस्था और महादेव के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया। आक्रांताओं को लगा कि वे जीत गए, लेकिन 1000 साल बाद भी सोमनाथ की ध्वजा पूरी दुनिया को भारत की शक्ति का संदेश दे रही है। प्रधानमंत्री ने साफ कहा कि सोमनाथ का इतिहास विनाश का नहीं, बल्कि विजय और पुनर्निर्माण का इतिहास है। उन्होंने कहा कि आक्रांता आते रहे, लेकिन हर युग में सोमनाथ फिर से खड़ा हुआ इतना धैर्य, संघर्ष और पुनर्निर्माण का उदाहरण दुनिया के इतिहास में दुर्लभ है। भारत के खिलाफ साजिशें की जा रहीपीएम मोदी ने कहा कि जो लोग अपने धर्म के प्रति सच्चे होते हैं, वे कभी कट्टरपंथी सोच का समर्थन नहीं करते। लेकिन उन्होंने आरोप लगाया कि तुष्टीकरण की राजनीति करने वालों ने हमेशा ऐसी सोच के आगे घुटने टेके। उन्होंने कहा कि जब आजादी के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया, तब भी उन्हें रोकने की कोशिश की गई। यहां तक कि 1951 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के मंदिर आने पर भी आपत्तियां जताई गई थीं। पीएम मोदी ने चेतावनी दी कि आज तलवारों की जगह नए और गुप्त तरीकों से भारत के खिलाफ साजिशें की जा रही हैं। ऐसे में देश को सतर्क, मजबूत और एकजुट रहने की जरूरत है।

सोमनाथ मंदिर विवाद, पीएम मोदी के समारोह से पहले BJP का आरोप बम

भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने बुधवार को सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार को लेकर देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के रुख की कड़ी आलोचना की है। त्रिवेदी ने आरोप लगाया कि महमूद गजनवी और अलाउद्दीन खिलजी जैसे ऐतिहासिक आक्रांताओं ने तो मंदिर को केवल भौतिक रूप से लूटा था, लेकिन नेहरू के मन में भगवान सोमनाथ के प्रति सबसे ज्यादा घृणा थी। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक पोस्ट साझा करते हुए त्रिवेदी ने नेहरू द्वारा कथित तौर पर पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को लिखे गए एक पत्र को साझा किया। त्रिवेदी ने दावा किया कि, इस पत्र में नेहरू ने खान को ‘प्रिय नवाबजादा’ कहकर संबोधित किया और सोमनाथ के दरवाजों की कथा को पूरी तरह झूठा बताया। उद्घाटन समारोह में शामिल न होने की सलाह दीभाजपा नेता का तर्क है कि यह पत्र एक प्रकार का आत्मसमर्पण था, जिससे यह संकेत मिलता है कि नेहरू ने भारत की सभ्यतागत विरासत की रक्षा करने के बजाय मंदिर के पुनर्निर्माण को कम महत्व देने की कोशिश की। उन्होंने आरोप लगाया कि पाकिस्तान के दुष्प्रचार का सामना करने के स्थान पर नेहरू ने पड़ोसी देश को खुश करने के लिए हिंदू ऐतिहासिक प्रतीकों को कमतर आंका। त्रिवेदी ने दावा किया कि नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का पूर्णतः विरोध किया था। उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन और मंत्रिमंडल के सहयोगियों को पत्र लिखकर मंदिर के पुनर्निर्माण की आवश्यकता पर प्रश्न उठाए थे और उन्हें उद्घाटन समारोह में शामिल न होने की सलाह दी थी। प्रदर्शित करने वाले कई कार्यक्रम आयोजितभाजपा नेता ने कहा कि नेहरू ने कथित तौर पर सभी मुख्यमंत्रियों को दो बार पत्र लिखकर शिकायत की थी कि मंदिर निर्माण से विदेशों में भारत की छवि धूमिल हुई है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री आर.आर. दिवाकर को पत्र लिखकर प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के प्रचार-प्रसार को कम करने का आग्रह किया था और इसे आडंबरपूर्ण बताया था। यह राजनीतिक घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 11 जनवरी को ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ समारोह में भाग लेने के लिए सोमनाथ मंदिर जाने वाले हैं। यह पर्व 8 जनवरी से 11 जनवरी तक मनाया जाएगा। इस दौरान भारत की आध्यात्मिक विरासत और सांस्कृतिक गौरव को प्रदर्शित करने वाले कई कार्यक्रम आयोजित होंगे।