जम्मू-कश्मीर विधानसभा में वक्फ कानून पर बवाल, लगातार दूसरे दिन ठप रही कार्यवाही

जम्मू-कश्मीर विधानसभा में मंगलवार को वक्फ कानून को लेकर लगातार दूसरे दिन भी तनावपूर्ण माहौल बना रहा। नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) केविधायकों ने इस कानून पर चर्चा की मांग करते हुए विरोध जताया, जबकि भाजपा विधायकों ने प्रस्ताव का विरोध किया। इस मुद्दे पर नेकां औरपीपुल्स कांफ्रेंस के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली। पीडीपी विधायक को सदन से बाहर निकाला गयाहंगामे के चलते प्रश्नकाल की कार्यवाही बाधित हुई। पीडीपी विधायक वाहिद परा को स्पीकर के निर्देश पर मार्शलों द्वारा बाहर निकाला गया, जिससेसदन का माहौल और अधिक तनावपूर्ण हो गया। आप और भाजपा के बीच भी तीखी बहसआप विधायक महाराज मलिक और भाजपा विधायक विक्रम रंधावा द्वारा मुफ्ती परिवार को लेकर की गई टिप्पणियों के बाद पीडीपी प्रवक्ता मोहितऔर मलिक के बीच बहस तेज हो गई। स्थिति को संभालने के लिए स्पीकर को सदन की कार्यवाही आधे घंटे के लिए स्थगित करनी पड़ी, लेकिन फिरभी प्रश्नकाल नहीं हो सका। पहले दिन भी रहा था तनावपूर्ण माहौलइससे पहले सोमवार को भी वक्फ कानून पर जमकर हंगामा हुआ था। विपक्ष ने इस विधेयक को मुस्लिम विरोधी करार देते हुए विरोध किया, जबकिभाजपा विधायकों ने इसका समर्थन किया। कांग्रेस विधायक इरफान लोन और भाजपा विधायक सतीश शर्मा के बीच हाथापाई की नौबत आ गईथी। सत्तापक्ष का स्थगन प्रस्ताव हुआ खारिजविधानसभा के बजट सत्र के दूसरे चरण के पहले दिन नेकां, पीडीपी, कांग्रेस और निर्दलीय विधायकों ने वक्फ कानून पर बहस के लिए स्थगन प्रस्तावरखा, जिसे स्पीकर ने अदालत में विचाराधीन मामला बताते हुए खारिज कर दिया। इस फैसले का विरोध करते हुए कई विधायक वेल तक पहुंच गएऔर नारेबाजी की। विधानसभा के नियमों का हवालास्पीकर अब्दुल रहीम राथर ने कहा कि विधानसभा के नियम 58(7) के तहत अदालत में विचाराधीन विषयों पर चर्चा नहीं हो सकती। इस पर विपक्ष नेआपत्ति जताई और कहा कि जब देश के अन्य राज्यों में वक्फ कानून पर चर्चा हो रही है, तो जम्मू-कश्मीर में क्यों नहीं हो सकती। सदन में नारेबाजी और प्रतीकात्मक विरोध नेकां विधायक सलाम सागर और तनवीर सादिक सहित अन्य विधायकों ने सदन के अंदर वक्फ कानून के खिलाफ नारे लगाए और पर्चे लहराए। कुछविधायकों ने प्रश्नकाल के दस्तावेज भी फाड़ दिए। विपक्ष का आरोप: लोकतांत्रिक अधिकार छीने जा रहेनेकां विधायक मुबारक गुल ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में मुस्लिम बहुल आबादी है और वक्फ कानून पर चर्चा करना लोकतांत्रिक अधिकार है। उन्होंनेकहा कि अगर भाजपा इस कानून को सही मानती है तो उसे सदन में मुस्लिम समुदाय के हितों के अनुसार समझाना चाहिए। नेता प्रतिपक्ष का पलटवारवहीं, नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा ने आरोप लगाया कि विपक्षी दल केवल नाटक कर रहे हैं और विधानसभा की कार्यवाही बाधित करने की कोशिश कररहे हैं। उन्होंने कहा कि यह सब मीडिया में दिखने की रणनीति है और विधानसभा को मंच की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।
राहुल गांधी ने राष्ट्रपति को लिखा पत्र,निष्पक्ष चयनित शिक्षकों की सेवा बहाल करने की अपील

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में 25,753 शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों की नियुक्तियों को अवैधकरार दिया। अदालत ने इस प्रक्रिया को “त्रुटिपूर्ण” बताया और कलकत्ता हाई कोर्ट के 22 अप्रैल 2024 के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें इननियुक्तियों को रद्द कर दिया गया था।राहुल गांधी की राष्ट्रपति से मानवीय हस्तक्षेप की मांगलोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 7 अप्रैल को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर इस फैसले के प्रभाव से प्रभावित शिक्षकों के पक्ष मेंदखल देने की अपील की। उन्होंने पत्र में कहा कि वे ‘शिक्षक-शिक्षिका अधिकार मंच’ के प्रतिनिधियों से मिलने के बाद इस मामले में पत्र लिखने कोप्रेरित हुए। बेदाग उम्मीदवार भी हुए प्रभावितराहुल गांधी ने अपने पत्र में इस बात पर चिंता व्यक्त की कि न्यायिक फैसलों के बाद उन उम्मीदवारों को भी सेवा से हटा दिया गया, जिनका चयन पूरीतरह निष्पक्ष और नियमों के अनुसार हुआ था। उन्होंने कहा कि “दागी” और “बेदाग” दोनों तरह के शिक्षकों को एक ही तरीके से सेवा से हटानान्यायसंगत नहीं है। एक दशक की सेवा, फिर भी नौकरी गईउन्होंने कहा कि अधिकतर ‘बेदाग’ शिक्षक लगभग 10 वर्षों से अपनी सेवा दे रहे थे और उनकी बर्खास्तगी न केवल उनके परिवारों के लिए आय कासंकट बन गई है, बल्कि इससे छात्रों की शिक्षा भी प्रभावित होगी, क्योंकि कक्षाएं बिना पर्याप्त शिक्षकों के चलेंगी। शिक्षकों की पीड़ा और छात्रों पर असरराहुल गांधी ने राष्ट्रपति से आग्रह किया कि वे एक पूर्व शिक्षिका होने के नाते इस स्थिति की मानवीय लागत को समझें। उन्होंने कहा कि शिक्षकों कीसेवा समाप्ति से उनका मनोबल टूटेगा और शिक्षा व्यवस्था पर भी बुरा असर पड़ेगा। निष्पक्ष चयनित शिक्षकों को राहत देने की मांगअपने पत्र के अंत में उन्होंने राष्ट्रपति से अनुरोध किया कि सरकार को निर्देशित किया जाए कि निष्पक्ष चयन प्रक्रिया से चयनित शिक्षकों को अपनीसेवा जारी रखने की अनुमति दी जाए। उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग अनियमितता के दोषी हैं, उन्हें न्याय के दायरे में लाया जाना चाहिए, लेकिननिर्दोषों के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला,तमिलनाडु के राज्यपाल की कार्रवाई असंवैधानिक घोषित

राज्यपाल को सुप्रीम कोर्ट की फटकारसुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि द्वारा 10 विधेयकों को रोके रखने को असंवैधानिक और मनमाना करार दिया है। अदालत ने साफकहा कि यह संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन है। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और आर. महादेवन की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि राज्यपाल नेविधेयकों को लेकर सद्भावपूर्ण और संवैधानिक तरीके से कार्य नहीं किया। राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच टकरावतमिलनाडु सरकार और राज्यपाल के बीच विधेयकों को लेकर लंबे समय से विवाद चला आ रहा था। नवंबर 2023 में राज्यपाल को 12 विधेयक भेजेगए थे, जिनमें से दो को उन्होंने राष्ट्रपति के पास भेज दिया और बाकी 10 पर कोई निर्णय नहीं लिया। राज्य सरकार ने राज्यपाल की निष्क्रियता केखिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। अदालत का सख्त रुख और निर्णयसुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए कहा कि 10 विधेयकों को उस तारीख से ही स्वीकृतमाना जाएगा, जब वे दोबारा राज्यपाल के पास भेजे गए थे। अदालत ने यह भी कहा कि राज्यपाल को संविधान के अनुसार कार्य करना चाहिए, न किराजनीतिक विचारधारा के आधार पर। विधेयकों पर समय सीमा निर्धारितकोर्ट ने भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश देते हुए कहा कि राज्यपाल को विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए एक निश्चित समय सीमा में कार्यकरना होगा। यदि कोई विधेयक मंत्रिपरिषद की सलाह पर राष्ट्रपति को भेजना है, तो यह प्रक्रिया अधिकतम एक महीने में पूरी होनी चाहिए। अगरबिना मंत्रिपरिषद की सलाह के विधेयक पर निर्णय रोका गया है, तो उसे तीन महीने के भीतर वापस करना होगा। अनुच्छेद 200 की व्याख्यान्यायालय ने कहा कि राज्यपाल को संविधान के अनुच्छेद 200 के अंतर्गत तीन विकल्प दिए गए हैं — विधेयक को स्वीकृति देना, उसे रोकना याराष्ट्रपति के पास भेजना। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्यपाल पॉकेट वीटो या पूर्ण वीटो का इस्तेमाल नहीं कर सकते। विधेयक को अनिश्चितकालतक लंबित रखना संवैधानिक प्रावधानों के विरुद्ध है। राज्य सरकारों के अधिकारों की पुष्टि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने इस फैसले को “ऐतिहासिक” करार देते हुए कहा कि यह निर्णय न केवल तमिलनाडु, बल्कि पूरे देश कीराज्य सरकारों के अधिकारों की पुष्टि करता है। उन्होंने कहा कि राज्यपाल को दोबारा पारित विधेयकों को स्वीकृति देना अनिवार्य था, लेकिन उन्होंनेजानबूझकर देरी की। दूसरे राज्यों में भी राज्यपालों पर सवालतमिलनाडु से पहले केरल और पंजाब में भी राज्यपालों पर विधेयकों को लंबित रखने के आरोप लगे हैं। केरल में राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान औरपंजाब में तत्कालीन राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित पर इसी तरह की याचिकाएं दायर की गई थीं। इन मामलों में भी सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपालों कीआलोचना करते हुए चेतावनी दी थी। लोकतंत्र और संघीय ढांचे की जीतसुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को लोकतंत्र और संघीय ढांचे की रक्षा के रूप में देखा जा रहा है। यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि राज्यपालों को अपनीसंवैधानिक सीमाओं में रहकर कार्य करना चाहिए और राज्य सरकारों द्वारा पारित विधेयकों को राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं देखना चाहिए।
चुनाव आयोग में TMC सांसदों के बीच तीखी बहस, वीडियो हुआ वायरल

4 अप्रैल 2025 को चुनाव आयोग के मुख्यालय में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के दो लोकसभा सांसदों के बीच ज़ोरदार बहस हो गई। यह घटना अबसार्वजनिक बहस का विषय बन चुकी है, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के आईटी सेल प्रमुख और पश्चिम बंगाल के लिए पार्टी पर्यवेक्षकअमित मालवीय ने इस बहस के वीडियो क्लिप्स सोशल मीडिया पर साझा किए हैं। अमित मालवीय का दावा: सांसदों में खुलकर हुआ विवादअमित मालवीय ने सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया कि चुनाव आयोग के दफ्तर में दो टीएमसी सांसद आपस में उलझ पड़े। उनका कहना है किएक सांसद ने बहस के बाद ‘वर्सेटाइल इंटरनेशनल लेडी’ को लेकर अपमानजनक टिप्पणी की, हालांकि उन्होंने स्पष्ट नहीं किया कि यह टिप्पणीकिसके लिए थी। वायरल वीडियो में सांसद कल्याण बनर्जी यह कहते सुनाई दे रहे हैं कि वे किसी पार्टी कोटे से नहीं आए हैं, न ही किसी और दल सेआकर टीएमसी में शामिल हुए हैं।कल्याण बनर्जी ने पेश की सफाईविवाद पर सफाई देते हुए टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने बताया कि उन्हें डेरिक ओ’ब्रायन की ओर से निर्देश मिला था कि 27 सांसदों से एकज्ञापन पर हस्ताक्षर करवाए जाएं। उनके मुताबिक, जब वे चुनाव आयोग के कार्यालय पहुँचे, तो एक महिला सांसद ने उन पर चिल्लाना शुरू करदिया। उनका आरोप था कि उन्हें जानबूझकर उस सूची से बाहर रखा गया, और फिर उन्होंने वहां मौजूद बीएसएफ जवानों से उन्हें गिरफ्तार करने कीबात तक कह दी। बहस की जड़: चुनाव आयोग में ज्ञापन देने को लेकर असहमतिबीजेपी आईटी सेल के प्रमुख ने यह भी आरोप लगाया कि टीएमसी नेतृत्व ने सांसदों को संसद कार्यालय में इकट्ठा होकर ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने केलिए कहा था, लेकिन कुछ सांसद सीधे चुनाव आयोग पहुंच गए और संसद सत्र में हिस्सा नहीं लिया। इससे अन्य सांसदों में नाराजगी फैल गई, जोचुनाव आयोग में आमने-सामने होने पर खुलकर सामने आई। दोनों सांसदों के बीच बहस इतनी तीखी हो गई कि पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। बहस का असर सोशल मीडिया और ग्रुप चैट तकअमित मालवीय ने यह भी बताया कि यह विवाद केवल चुनाव आयोग कार्यालय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि टीएमसी के “एआईटीसी एमपी 2024” नामक व्हाट्सएप ग्रुप में भी दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप चलता रहा। उन्होंने ग्रुप चैट के कुछ स्क्रीनशॉट भी साझा किए हैं, जिसमें दोनों पक्षोंकी तनातनी साफ दिख रही है।
कांग्रेस का 84वां अधिवेशन, अहमदाबाद से राष्ट्रव्यापी संदेश

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 84वां पूर्ण अधिवेशन 8 और 9 अप्रैल 2025 को गुजरात के अहमदाबाद में आयोजित हुआ। यह अधिवेशन राजनीतिकदृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण रहा, जिसमें पार्टी की रणनीतियों, विचारधाराओं की पुनः पुष्टि और आगामी कार्यक्रमों की रूपरेखा पर चर्चा हुई। अधिवेशन का मकसद और चर्चा का केंद्रइस अधिवेशन का प्रमुख उद्देश्य केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ पार्टी की रणनीति तैयार करना और संविधान, लोकतंत्र तथा गांधीवादीविचारधारा पर हो रहे हमलों का विरोध करना था। कांग्रेस नेताओं ने मिलकर उन नीतियों और घटनाओं पर चर्चा की, जिन्हें वे जनविरोधी और लोकतंत्रविरोधी मानते हैं। अधिवेशन ने यह संदेश देने की कोशिश की कि कांग्रेस इन मुद्दों पर स्पष्ट और संगठित रूप से देश के सामने खड़ी है। कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) की अहम बैठकअधिवेशन की शुरुआत कांग्रेस कार्यसमिति की विस्तारित बैठक से हुई, जो लगभग चार घंटे तक चली। इस बैठक में वर्तमान राजनीतिक हालात, चुनावी रणनीति और पार्टी के संगठनात्मक मुद्दों पर विचार-विमर्श किया गया। बैठक में संविधान की रक्षा और गांधीवादी मूल्यों के प्रचार के लिएविशेष प्रस्ताव भी पारित किए गए। गांधीवादी विचारधारा पर हो रहा हमला: जयराम रमेशकांग्रेस प्रवक्ता जयराम रमेश ने प्रेस को संबोधित करते हुए कहा कि आज महात्मा गांधी की विचारधारा पर योजनाबद्ध तरीके से हमला किया जा रहाहै। उन्होंने स्पष्ट किया कि कांग्रेस गांधीजी की विरासत की रक्षा और उसके प्रचार-प्रसार के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। पार्टी का मानना है कि राष्ट्रपिताकी सोच आज के समय में और अधिक प्रासंगिक हो गई है। ‘जय बापू, जय भीम, जय संविधान’ रैली की घोषणाअधिवेशन में यह घोषणा की गई कि कांग्रेस 27 दिसंबर को बेलगावी में एक भव्य रैली आयोजित करेगी, जिसका नाम होगा – ‘जय बापू, जय भीम, जय संविधान’। इस रैली का उद्देश्य गांधीजी और डॉ. बी.आर. आंबेडकर की विचारधाराओं की रक्षा और संविधान की मूल भावना को जन-जन तकपहुँचाना है। आने वाले कार्यक्रम और जनजागरण अभियानकांग्रेस ने यह भी ऐलान किया कि 26 जनवरी 2025 से लेकर 26 जनवरी 2026 तक पार्टी ‘संविधान बचाओ पदयात्रा’ नामक देशव्यापी अभियानचलाएगी। इस यात्रा के माध्यम से पार्टी संविधान की मूल भावना और लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षण के लिए जनजागरण करेगी, खासकर युवाओंऔर ग्रामीण समुदायों को जागरूक करने पर ज़ोर रहेगा।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू पहुंची पुर्तगाल के दौरे पर,27 साल बाद होगा किसी भारतीय राष्ट्रपति का पहला पुर्तगाल दौरा

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू रविवार रात (स्थानीय समयानुसार) पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन पहुंचीं. यह पुर्तगाल और स्लोवाकिया की उनकी 7 से 10 अप्रैलतक की चार दिन की राजकीय यात्रा की शुरुआत है. मुर्मू यह दौरा पुर्तगाल के राष्ट्रपति मार्सेलो रेबेलो डी सूसा के निमंत्रण पर कर रही हैं. यह यात्रा 27 साल बाद हो रही है. इससे पहले 1998 में तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन ने पुर्तगाल की राजकीय यात्रा की थी.9 से 10 अप्रैल को राष्ट्रपतिमुर्मू स्लोवाकिया में रहेंगी. यह यात्रा स्लोवाकिया के राष्ट्रपति पीटर पेल्लेग्रिनी के निमंत्रण पर हो रही है. पिछले 29 वर्षों में किसी भारतीय राष्ट्रपति कीयह पहली स्लोवाकिया यात्रा होगी.इससे पहले विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने रविवार को एक्स पर एक पोस्ट में लिखा राष्ट्रपतिद्रौपदी मुर्मू ने पुर्तगाल और स्लोवाक गणराज्य की राजकीय यात्रा के लिए प्रस्थान किया. पिछले 25 वर्षों से ज्यादा समय बाद भारत की राष्ट्रपति कीइन दोनों देशों में पहली राजकीय यात्रा है. दोनों देशों की दोस्ती और साझेदारी को बढ़ाएगी आगेविदेश मंत्रालय के सचिव (पश्चिम) तन्मय लाल ने कहा यह यात्रा भारत के इन दोनों अहम यूरोपीय साझेदारों के साथ बहुआयामी सहयोग को औरविस्तार देगी. उन्होंने इसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक यात्रा बताया. पुर्तगाल यात्रा के बारे में जानकारी साझा करते हुए सचिव तन्मय लाल ने कहा किराष्ट्रपति की यात्रा ऐतिहासिक बन जाती है क्योंकि भारत और पुर्तगाल इस समय अपने राजनयिक संबंधों के 50 साल पूरे कर रहे हैं. यह यात्रा दोनोंदेशों की दोस्ती और साझेदारी को आगे बढ़ाएगी.उन्होंने कहा भारत के राष्ट्रपति की पुर्तगाल की पिछली यात्रा को 27 साल हो चुके हैं. इसलिए यहयात्रा बहुत प्रतीकात्मक और ऐतिहासिक है. राष्ट्रपति पुर्तगाल के राष्ट्रपति मार्सेलो रेबेलो डी सूसा के निमंत्रण पर वहां जा रही हैं. सचिव लाल ने बतायाकि पिछले कुछ वर्षों में भारत और पुर्तगाल के बीच उच्च स्तरीय दौरे लगातार हुए हैं. जो दोनों देशों के बीच मजबूत और सक्रिय संबंधों को दर्शाते हैं.
प्रधानमंत्री मोदी ने श्रीलंका में महो-अनुराधापुरा रेलवे लाइन का किया शुभारंभ,पड़ोसी देशों के विकास में अहम भूमिका निभा रहा भारत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्रीलंका की हालिया यात्रा के दौरान 128 किलोमीटर लंबी महो-अनुराधापुरा रेलवे लाइन के लिए सिग्नलिंग सिस्टम काशुभारंभ किया. पिछले 10 वर्षों में पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत की ओर से अपने पड़ोसी देशों को दी गई सहायता और परियोजनाओं की लंबी सूचीहै. यह भारत की नेबरहुड फर्स्ट नीति और वसुधैव कुटुंबकम के सिद्धांतों के तहत क्षेत्रीय विकास में एक विश्वसनीय साझेदार के रूप में प्रतिबद्धता कोदर्शाता है.श्रीलंका में भारत ने इंडियन हाउसिंग प्रोजेक्ट (फेज 3) के तहत मध्य और उवा प्रांतों में बागान श्रमिकों के लिए लगभग 4,000 घर बनाए. 2022 में श्रीलंका के आर्थिक संकट के दौरान भारत ने एक बिलियन डॉलर की क्रेडिट लाइन दी. इससे श्रीलंका को भोजन, दवाइयां और अन्यआवश्यक वस्तुओं के आयात में मदद मिली. सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करते हुए पीएम मोदी ने 2015 में जाफना यात्रा के दौरान जाफनासांस्कृतिक केंद्र की आधारशिला रखी. 2022 में इसके उद्घाटन के बाद 2023 में श्रीलंका के लोगों को समर्पित किया गया.नेपाल के साथ ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग बढ़ा है. मोतिहारी-अमलेखगंज पेट्रोलियम पाइपलाइन का उद्घाटन 2019 में किया गया था. यह दक्षिण एशियाकी पहली सीमा पार पेट्रोलियम पाइपलाइन बनी.ग्रीनफील्ड टर्मिनल के लिए हुआ समझौताजून 2023 में सिलिगुड़ी-झापा पाइपलाइन और चितवन व झापा में दो ग्रीनफील्ड टर्मिनल के लिए समझौता हुआ. दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों नेअप्रैल 2022 में जयनगर-कुर्था-बरदिबास रेल लिंक का उद्घाटन किया.जोगबनी-बिराटनगर रेल लिंक का माल ढुलाई खंड जून 2023 में शुरू हुआ. जबकि रक्सौल-काठमांडो रेल लिंक की अंतिम सर्वे रिपोर्ट तैयार हो रही है. व्यापार के लिए नेपालगंज, बिराटनगर और बीरगंज में एकीकृत जांचचौकियां (आईसीपी) विकसित की गई हैं. 2015 के भूकंप के बाद भारत ने एक बिलियन डॉलर की सहायता दी. जिसमें 250 मिलियन डॉलरअनुदान और 750 मिलियन डॉलर क्रेडिट लाइन के तौर पर शामिल थे. सोलु कॉरिडोर 132 केवी ट्रांसमिशन लाइन (2022) और मोदी-लेखनाथट्रांसमिशन लाइन (2023) ने नेपाल में बिजली आपूर्ति में सुधार किया. नेपाल को स्वास्थ्य क्षेत्र में 200 किडनी डायलिसिस मशीनें और 50 रिवर्सऑस्मोसिस सिस्टम दिए गए. बांग्लादेश में 270.2 करोड़ की लागत से बनी अखौराबांग्लादेश में 270.2 करोड़ रुपये की लागत से बनी अखौरा-अगरतला रेल लिंक और मैत्री सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट (2023) का उद्घाटन पीएममोदी ने किया. खुलना-मोंगला रेल लाइन और भारत-बांग्लादेश मैत्री पाइपलाइन का निर्माण 285.24 करोड़ रुपये की लागत से किया गया. इसनेऊर्जा और कनेक्टिविटी में अहम योगदान दिया. आपात स्वास्थ्य सहायता के लिए 109 बेसिक लाइफ सपोर्ट एम्बुलेंस दी गईं.अफगानिस्तान में भीभारत का सहयोग व्यापक रूप से है. 2016 में पीएम मोदी ने अफगान-भारत मैत्री बांध (सलमा बांध) का उद्घाटन किया. सिंचाई और बिजली आपूर्तिमें इसकी अहम भूमिका है. 2015 में अफगान संसद भवन का उद्घाटन भी पीएम मोदी ने किया. जो अफगान लोकतंत्र के प्रति समर्थन का प्रतीकहै.संकट के समय में खाद्य सुरक्षा के लिए भारत ने 2.45 लाख मीट्रिक टन गेहूं की आपूर्ति की.
क्या बिहार स्वीकार करेंगा कन्हैया कुमार को , राहुल गांधी के दौरे से पहले कैसा था कन्हैया कुमार का चुनावी प्रदर्शन “जानिए”

Bihar assembly Election: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में अभी करीब छह-सात महीने का समय है. राज्य में राजनीतिक गतिविधियां तेजहो रही हैं गतिविधियां तेज कर कांग्रेस इस बार ज्यादा मुखर रूप से उतरी हुई नजर आ रही है. आश्चर्यज के रूप में कांग्रेस ने युवा नेता कन्हैया कुमार कोदिल्ली में आजमाने के बाद बिहार भेजा है. कन्हैया दिल्ली में कांग्रेस की ओर से आजमाए जाने के पहले बिहार में वामदल के साथ अपनी किस्मतआजमा कर निकले थे. इस बार लौटे हैं तो कांग्रेस के नंबर वन नेता राहुल गांधी उन्हें ‘री-लांच’ करने बेगूसराय भी पहुंच रहे हैं. सोमवार को राहुल गांधीके साथ कन्हैया कुमार को पदयात्रा करनी है. युवाओं का मुद्दा है माहौल भी बना हुआ है। ऐसे में यह भी जानना चाहिए.याद दिलाने की जरूरत नहीं किजवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय दिल्ली में विवादित बोल के कारण कन्हैया कुमार पहली बार चर्चा में आए थे. कन्हैया का जो बयान चर्चा में रहा था. उसे लेकर पूरे देश में कहीं-न-कहीं गुस्से का माहौल था. इसके बावजूद कन्हैया का चेहरा तेजी से उभरा था. दिल्ली में चर्चित यह युवक बेगूसराय का हैयह जानकर उस समय बिहार में भी रोष का माहौल बना था. फिर उसी माहौल में उनके साथ एक लंबी-चौड़ी नेताओं की टोली जुटी और उसने खुलकरसाथ दिया. भाजपा विरोधी नेता हुए थे शामिलकन्हैया कुमार जब दिल्ली में चर्चा में आए तो भाजपा-विरोधी नेताओं का एक बड़ा नेटवर्क उनके साथ जुड़ता गया. यह नेटवर्क कन्हैया के प्रति इतनासमर्पित था कि 2019 के लोकसभा चुनाव में जब सीपीआई ने कन्हैया कुमार को बेगूसराय संसदीय सीट पर प्रत्याशी बनाया तो एक-एक कर देश केतमाम ऐसे दिग्गज चुनाव प्रचार के लिए पहुंचे. बेगूसराय उस समय हॉट सीट बन गया. क्योंकि पूरे देश से भाजपा-विरोधी नेताओं का हुजूम कन्हैया केसमर्थन में बिहार आ रहा था. इस चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल ने भी बेगूसराय से प्रत्याशी दे दिया था. हालांकि लोकसभा चुनाव परिणाम आया तोसीपीआई और राजद का वोट मिलाकर भी भारतीय जनता पार्टी प्रत्याशी गिरिराज सिंह से बहुत दूर था. गिरिराज सिंह को इस चुनाव में 6,92,193 वोट मिले थे. असहज स्थित में आए नजरबेगूसराय लोकसभा सीट पर करारी हार के बाद कन्हैया कुमार को लेकर वामदलों के अंदर भी सहजता नहीं दिखी और वह खुद भी असहज स्थिति मेंनजर आए. इधर-उधर नजर दौड़ाने के बाद कन्हैया ने वापस अपनी राजनीति के जड़ यानी दिल्ली की ओर रुख किया. कांग्रेस ने उन्हें हाथोंहाथ लिया. बिहार के युवा चेहरे को कांग्रेस ने दिल्ली में वक्त के साथ बड़ा मौका भी दिया. 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उत्तर पूर्वी दिल्ली से भाजपा केमनोज तिवारी के सामने कन्हैया कुमार को उतारा. कन्हैया ने यहां मनोज तिवारी को ठीकठाक टक्कर दी. बेगूसराय में गिरिराज सिंह के 56.44 प्रतिशतके मुकाबले जहां कन्हैया को 22.01 प्रतिशत वोट मिले थे. वहीं उत्तर पूर्वी दिल्ली में मनोज तिवारी के 53.1 प्रतिशत के मुकाबले 44.16 फीसदीवोट मिले. मनोज तिवारी को 8,24,451 मत मिले थे तो कन्हैया कुमार को 6,85,673 वोट मिले थे. कन्हैया को बेगूसराय से ज्यादा दिल्ली में महत्वमिला. यह तो तय हो गया.
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कही बड़ी बात, चीजों को सही करने के लिए देनी पड़ती है दवाई

राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने टैरिफ लगाने के फैसले को वापस लेने से साफ मना कर दिया है. गौरतलब है कि ट्रंप के टैरिफ लगाने के बाद दुनियाभर के बाजारोंमें अस्थिरता का माहौल है और देश में भी उनका विरोध शुरू हो गया है. हालांकि ट्रंप ने अपने फैसले से पीछे हटने से मना कर दिया है और कहा है किकभी कभी चीजों को सही करने के लिए दवाई देने की जरूरत पड़ती है.अपने आधिकारिक विमान एयरफोर्स वन में मीडिया के साथ बातचीत में ट्रंप नेकहा कि वह नहीं चाहते कि दुनियाभर के बाजारों में गिरावट आए. लेकिन मैं इसे लेकर चिंतित नहीं हूं. कई बार आपको चीजों को सही करने के लिएदवाई लेनी पड़ती है.वहीं ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों का कहना है कि टैरिफ लगाने का असर दिखने लगा है और 50 से ज्यादा देशों के प्रतिनिधियों नेबातचीत की इच्छा जाहिर की है. दुनिया के कई नेताओं से की बातचीतट्रंप ने कहा कि मैंने यूरोपीय, एशियाई, पूरी दुनिया के कई नेताओं से बात की है. वे हमारे साथ समझौता करना चाहते हैं. लेकिन अब हम व्यापार घाटानहीं सहेंगे और हमने ये बात उन्हें साफ बता दी है.ट्रंप द्वारा विभिन्न देशों पर लगाए टैरिफ 9 अप्रैल से लागू हो जाएंगे. अर्थशास्त्रियों का कहना है किटैरिफ लागू होने के साथ ही नए आर्थिक युग की भी शुरुआत हो सकती है. अमेरिका की वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा कि गलत तरीके से व्यापारकरना सही नहीं है और हम देखेंगे कि विभिन्न देश में हमें क्या ऑफर करते हैं उसके बाद हम आगे का फैसला करेंगे. उन्होंने कहा कि कोई मंदी नहींआएगी बाजार एक दो दिन टैरिफ को लेकर प्रतिक्रिया देगा. लेकिन हमारी कोशिश है कि हम लंबे समय के लिए आर्थिक संबंध बनाएं. ट्रंप भी टैरिफके मुद्दे पर हो रहे विरोध को लेकर सचेत हैं. रविवार को सोशल मीडिया पर साझा एक पोस्ट में उन्होंने लिखा कि हमारी जीत होगा. लेकिन तब तकहिम्मत बनाए रखें. नहीं होगा आसानये आसान बिल्कुल नहीं होगा. ट्रंप ने अपनी कैबिनेट के मंत्रियों को अधिकारियों को भी निर्देश दिया है कि वे टैरिफ लगाने के सरकार के फैसले काबचाव करें और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ने के दावे को खारिज करें.ट्रंप ने अमेरिका के सहयोगी देशों पर भी टैरिफ लगाए हैं. जिनमेंइस्राइल पर भी 17 प्रतिशत टैरिफ लगाया गया है. सोमवार को इस्राइली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति ट्रंप से मुलाकात करेंगे. माना जा रहा है कि गाजा युद्ध के अलावा टैरिफ को लेकर भी दोनों देशों के बीच बातचीत हो सकती है. वियतनाम पर भी ट्रंप ने भारी भरकम टैरिफलगाया है.अब वियतनाम की सरकार ने भी अपने टैरिफ घटाने की बात करते हुए अमेरिका के साथ बातचीत की पेशकश की है. इटली की पीएमजॉर्जिया मेलोनी ने अमेरिका के टैरिफ पर नाराजगी जताई. लेकिन कहा है कि वह इस मुद्दे पर अमेरिकी सरकार से बातचीत के लिए तैयार हैं.
कैसी रही है बिहार की राजनीति? कभी 13 विधायकों वाले दल के नेता बने थे बिहार के सीएम, तो कोई महज 50 दिन ही रहा सीएम

Bihar Politics: बिहार की राजनीति हमेशा से दिलचस्पी पैदा करने वाली रही है. फिर चाहे वह आजादी के बाद राज्य में कांग्रेस की सरकार काशासन हो या फिर जनता दल के बढ़ते वर्चस्व की कहानी और या फिर लालू प्रसाद यादव और इसके बाद नीतीश कुमार के राजनीतिक पटल पर छाजाने की दास्तां. बिहार हमेशा से राजनीतिक हलचल का केंद्र रहा है. यह हलचल राज्य में उस दौरान भी दिखी, जब आजादी के बाद कांग्रेस कीसरकार बनी थी. इतना ही नहीं जब 1967 में पहली बार कांग्रेस की सरकार गिरी तो राज्य की राजनीति इतनी दिलचस्प हो गई कि अगले 10 सालतक कोई मुख्यमंत्री तीन साल भी शासन पूरा नहीं कर पाया. इनमें कोई नेता सिर्फ 16 विधायकों के साथ मुख्यमंत्री बन गया. तो कोई महज 4 दिन हीसीएम रह पाया.बिहार में पहली सरकार 1946 में श्री कृष्ण सिन्हा के नेतृत्व में बनी थी. चूंकि वह बिना चुनाव के ही मुख्यमंत्री बन गए थे। इसलिएकांग्रेस ने 1952 में उनके नेतृत्व में ही चुनाव लड़ने का फैसला किया. इसके बाद सिन्हा 1961 में अपने निधन तक राज्य के मुख्यमंत्री पद पर रहे. हालांकि बताया जाता है कि कृष्ण सिन्हा के नेतृत्व में कांग्रेस में आंतरिक राजनीति लगातार जारी रही. खासकर जातीय स्तर पर यह सियासत सिन्हा केनिधन के बाद और खुलकर सामने आ गई. पद को लेकर छिड़ गई थी जंगदरअसल तब ब्राह्मण वर्ग से आने वाले बिनोदानंद झा कायस्थ समाज से आने वाले केबी सहाय और भूमिहार एमपी सिन्हा के बीच सीएम पद के लिएजंग छिड़ गई. इससे कांग्रेस को भारी घाटा हुआ और इसमें कई धड़े बन गए.यहीं से शुरुआत हुई कांग्रेस के राज्य में कमजोर होने और एक के बाद एकमुख्यमंत्रियों के बदलने की. दरअसल बिहार में पहले कांग्रेस ने श्री कृष्ण सिन्हा की जगह लेने के लिए दीप नारायण सिंह का नाम तय किया. हालांकिपार्टी में बढ़ती आंतरिक कलह की वजह से दीप नारायण महज 17 दिन बाद ही सीएम पद से हट गए. कांग्रेस में बीएन झा के धड़े की जीत हुई और1961 में उन्होंने सीएम पद की शपथ ली. हालांकि महज ढाई साल में ही झा को भी सीएम पद छोड़ना पड़ा और आलाकमान ने कायस्थ नेता कृष्णबल्लभ सहाय को सीएम बना दिया. सहाय ने इसके बाद पार्टी के बचे हुए कार्यकाल तक मुख्यमंत्री पद संभाला.1967 में कांग्रेस की हार के बादराज्य के मुख्यमंत्री बने महामाया प्रसाद सिन्हा महामाया प्रसाद खुद कायस्थ समुदाय से आते थे. और एक जमाने में बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्णसिन्हा से विवाद के चलते कांग्रेस छोड़ चुके थे. खुद की बनाई थी पार्टीउन्होंने अपनी खुद की एक पार्टी बनाई थी. जन क्रांति दल उनके मुख्यमंत्री बनने की कहानी कांग्रेस नेताओं के सीएम बनने से कहीं ज्यादा दिलचस्प है. दरअसल 1967 के चुनाव में महामाया प्रसाद ने सीधा मुख्यमंत्री केबी सहाय को पटना पश्चिम सीट से चुनौती दे दी थी. चौंकाने वाली बात यह है किमहामाया प्रसाद ने सीएम सहाय को इस चुनाव में बुरी तरह हरा दिया.यह चुनाव कांग्रेस के लिए भी कांटोभरा साबित हुआ दरअसल बिहार विधानसभाकी 318 सीटों में कांग्रेस को महज 128 सीटें मिलीं. वहीं राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व में विपक्षी दलों के गठबंधन ने बहुमत हासिल कर लिया. संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (एसएसपी) को 68 सीट पर जीत मिली. इसके अलावा जनसंघ को 26, भाकपा को 24 और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी(पीएसपी) को 18 सीटें मिली. महामाया प्रसाद की एसएसपी ने इस चुनाव में 13 सीटें जीतीं और इसके साथ ही बिहार में कांग्रेस को सरकार से हटानेके लिए साथ आया संयुक्त विधायक दल.