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उर्दू शायरी और अदब से मोहब्बत रखने वालों के लिए दिल्ली का राजेंद्र भवन उस वक्त खास बन गया, जब मशहूर शायर हज़रत जौन एलिया साहबकी 94वीं जयंती पर एक शानदार शायरी महफ़िल का आयोजन किया गया। इस यादगार कार्यक्रम का आयोजन नया एहसास फाउंडेशन की ओर सेकिया गया, जिसमें शायरी के दीवानों ने बड़ी संख्या में शिरकत की और जौन एलिया साहब को दिल से याद किया।

जौन एलिया आज भी लोगों के दिलों में ज़िंदा
जौन एलिया भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी रूमानी और इश्क़िया शायरी आज भी लोगों के दिल और दिमाग पर राज करती है। उनकीग़ज़लों में मोहब्बत, दर्द, तन्हाई और बिछड़ने की कसक साफ महसूस की जा सकती है। यही वजह है कि हर दौर के लोग, खासकर नौजवान, आज भीजौन एलिया की शायरी से खुद को जुड़ा हुआ महसूस करते हैं।

राजेंद्र भवन में सजी यादों की महफ़िल
रविवार को आयोजित यह शायरी और ग़ज़ल की महफ़िल शाम तक चली। पूरे कार्यक्रम को दो हिस्सों में बांटा गया था। पहले हिस्से में जौन एलियासाहब को याद करते हुए मुशायरे का आयोजन किया गया, जिसमें उर्दू शायरी के कई जाने-माने नाम शामिल हुए।

मशहूर शायरों की मौजूदगी ने बढ़ाई शोभा
मुशायरे में हमारे दौर के मकबूल शायर जनाब फरहत एहसास साहब, मशहूर शायर जनाब महेंद्र कुमार सानी, राजकमल प्रकाशन के संपादक औरशायर तसनीफ़ हैदर साहब सहित कई अन्य शायरों ने अपनी शायरी से महफ़िल को यादगार बना दिया। इस मौके पर जौन एलिया साहब की भांजीहुमा रिज़वी साहिबा की मौजूदगी ने कार्यक्रम को और खास बना दिया।

किताब का रस्मइजरा बना खास पल
कार्यक्रम के दूसरे हिस्से में एक और खास आयोजन हुआ। शायरा पूजा भाटिया की ग़ज़लों की किताब उसे कहना कि ये मैंने कहा है का रस्म-ए-इजराकिया गया। यह किताब हिंद युग्म से प्रकाशित हुई है। किताब का लोकार्पण मशहूर शायर फरहत एहसास साहब के हाथों हुआ, जिसे उपस्थितसाहित्य प्रेमियों ने खूब सराहा।

नई पीढ़ी के पसंदीदा शायर
जौन एलिया का जन्म 14 दिसंबर 1931 को उत्तर प्रदेश के अमरोहा शहर में हुआ था। उनका इंतिकाल 8 नवंबर 2003 को हुआ। उनके जाने के बादभी उनकी शायरी की लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई। हिंदी में उनकी शायरी के कई अनुवाद हुए, जिससे और ज्यादा लोग उनके कलाम से जुड़ सके।

इल्म और अदब से गहरा रिश्ता
जौन एलिया बचपन से ही इल्म और साहित्य के शौकीन थे। उन्हें उर्दू के साथ-साथ अरबी, फारसी, हिब्रू, संस्कृत और अंग्रेज़ी कुल छह भाषाओं कागहरा ज्ञान था। अपने आज़ाद ख्याल और गैर-रिवायती अंदाज़ की वजह से उन्होंने उर्दू शायरी में एक अलग पहचान बनाई।

बंटवारे का दर्द उनकी शायरी में झलका
हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बंटवारे का जौन एलिया को गहरा सदमा लगा था। हिजरत का यह दर्द उनकी शायरी में साफ नजर आता है। उन्होंने अपनेअशआर में बिछड़ने, टूटने और खोने के दर्द को बहुत सच्चाई से बयान किया है।

सोशल मीडिया पर भी जौन एलिया का जादू
आज के इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में जौन एलिया की शायरी पहले से ज्यादा लोगों तक पहुंच रही है। सोशल मीडिया पर उनके कलाम सेजुड़े कई पेज, वेबसाइट और चैनल मौजूद हैं। यही वजह है कि उनके चाहने वालों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है।

अमरोहा से खास मोहब्बत
पाकिस्तान जाने के बाद भी जौन एलिया के दिल से हिंदुस्तान और खासकर अमरोहा कभी अलग नहीं हुआ। उन्हें अपने शहर से गहरा लगाव था। एकमुशायरे के दौरान उन्होंने कहा था ख़ातिर न कीजियो, कभी हम भी यहाँ के थे। यह पंक्ति आज भी उनके दर्द और मोहब्बत की गवाही देती है।

शायरी के ज़रिये जौन एलिया हमेशा ज़िंदा
जौन एलिया भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी शायरी उन्हें हमेशा ज़िंदा रखेगी। राजेंद्र भवन में सजी यह महफ़िल इस बात का सबूत थी किजौन एलिया आज भी उर्दू अदब के चाहने वालों के दिलों में पूरी शिद्दत से बसे हुए हैं।


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