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लोकसभा में बुधवार को चुनाव सुधारों पर उस समय जोरदार बहस छिड़ गई जब कांग्रेस और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त(सीईसी) और चुनाव आयुक्तों के चयन पैनल से भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को हटाए जाने पर अपनी-अपनी दलीलें रखीं। दोनों दलों नेइस मुद्दे पर अपनी ठोस राय सामने रखकर सदन का माहौल गरम कर दिया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता केसी वेणुगोपाल ने सरकार से पूछा कि आखिर वहसुप्रीम कोर्ट की उस व्यवस्था से पीछे क्यों हट गई, जिसमें चयन समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सीजेआई को शामिल करने का निर्देश दियागया था। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार को बताना चाहिए कि अंतिम बिल में सीजेआई को बाहर क्यों रखा गया। इसके तुरंत बाद भाजपा केवरिष्ठ नेता और पूर्व कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस पर पलटवार किया और सरकार के फैसले का बचाव किया।

हर कार्य में न्यायपालिका को शामिल करने की मांग तर्कसंगत
कांग्रेस नेता वेणुगोपाल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसका नेतृत्व अब सेवानिवृत्त न्यायाधीश के. एम. जोसेफ कर रहे थे, ने स्पष्ट किया था किजब तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर कोई व्यापक कानून नहीं बन जाता, तब तक चयन समिति में प्रधानमंत्री, सीजेआई और लोकसभा में विपक्षके नेता को शामिल किया जाए। लेकिन जब सरकार बिल लेकर आई, तो उसने सीजेआई को पूरी तरह बाहर कर दिया और उसकी जगह प्रधानमंत्रीद्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री को शामिल कर दिया। उन्होंने मांग की कि कानून मंत्री इस फैसले पर स्पष्ट जवाब दें। भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने इसआरोप को खारिज करते हुए कहा कि जब देश की जनता प्रधानमंत्री को परमाणु बटन तक संभालने का भरोसा देती है, तो वही प्रधानमंत्री और उनकेनेतृत्व वाली सरकार एक ईमानदार और सक्षम चुनाव आयुक्त क्यों नहीं चुन सकती। उन्होंने जोर देकर कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनी हुईसरकार को निर्णय लेने का अधिकार है, और हर कार्य में न्यायपालिका को शामिल करने की मांग तर्कसंगत नहीं है।

कदम चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को कमजोर करेगा
रविशंकर प्रसाद ने आगे कहा कि स्वयं वेणुगोपाल भी जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का यह प्रावधान सिर्फ एक अंतरिम व्यवस्था थी, स्थायी समाधान नहीं।उन्होंने कहा कि संसद ने व्यापक विचार के बाद नया कानून पारित किया है और इसके बाद भी सीजेआई को पैनल में शामिल रखने की मांग राजनीतिसे प्रेरित है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस चयन प्रक्रिया को राजनीतिक रंग देकर जरूरी सुधारों को बाधित करना चाहती है। सरकार द्वारापेश किए गए बिल को संसद पहले ही मंजूरी दे चुकी है, जिसके तहत प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति में एक केंद्रीय मंत्री और लोकसभा केविपक्ष के नेता शामिल होंगे। लेकिन सीजेआई को शामिल न किए जाने से विपक्ष को तीखा विरोध करने का मौका मिला है। कांग्रेस का कहना है कियह कदम चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को कमजोर करेगा, जबकि भाजपा दावा करती है कि यह कदम पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए लियागया है।

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