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अमेरिका की तरफ से व्यापारिक साझेदारों को व्यापार सौदों को अंतिम रूप देने के लिए दी गई एक अगस्त की समयसीमा पूरी होने में बस दो दिन बचेहैं. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या भारत उच्च टैरिफ की काट निकाल पाएगा? ट्रंप कह चुके हैं कि जिन देशों के साथ समझौते नहीं हुए हैं. उन पर15-20 फीसद के दायरे में टैरिफ लगेगा. भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता जिस तरह आगे बढ़ी है. उसे देखते अंतरिम समझौता अभी दूर की कौड़ी ही है. हालांकि, दोनों ही देशों की तरफ से कई बिंदुओं पर सहमति बनने की बात कही जा रही है. वार्ता को लेकर तीन बिंदु एकदम साफ हैं. एक, अमेरिकाभारतीय बाजारों में शून्य शुल्क पहुंच की पुरजोर कोशिश कर रहा है। दूसरी तरफ, भारत यह तय करने में जुटा है कि अमेरिका को उसके माल निर्यातपर मुख्य टैरिफ 15 प्रतिशत से अधिक न हो.

टैरिफ बचने का रास्ता रहा है बना
तीसरा, टैरिफ निवेश प्रतिबद्धताओं और उच्च-मूल्य वाली खरीदारी जैसे बाहरी कारकों पर भी निर्भर करता है. इसे देखते हुए यह अनुमान लगाया जारहा है कि बड़े निवेश व अमेरिकी हथियारों की खरीद पर सहमति जताकर भारत उच्च टैरिफ से बचने का रास्ता बना सकता है. माना जा रहा है कि ट्रंपप्रशासन भारत पर विशिष्ट खरीदारी और निवेश की प्रतिबद्धता जताने का दबाव बना रहा है, जैसा उसने यूरोपीय संघ और जापान से कराया था. यहभारत के लिए कोई बड़ा मुद्दा नहीं हो सकता है क्योंकि ट्रंप बिना किसी निश्चित समयसीमा के बड़ी निवेश प्रतिबद्धता के जरिये राजनीतिक लाभ उठानेके इच्छुक हो सकते हैं. द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर अगले दौर की बातचीत के लिए अमेरिकी टीम 25 अगस्त को भारत का दौरा करेगी.

फिलहाल टालने में रहा कामयाब
भारत कृषि और डेयरी जैसे दो विवादास्पद मुद्दों को फिलहाल टालने में कामयाब रहा है. लेकिन सार्वजनिक खरीद जैसे क्षेत्रों में लचीलापन अपनाने कोतैयार हो सकता है जैसा उसने ब्रिटेन के व्यापार समझौते में किया था। हालांकि और भी कई पेचीदगियां बरकरार है. भारतीय वार्ताकारों के लिए स्टीलव एल्युमीनियम पर आधार रेखा से ऊपर अतिरिक्त टैरिफ अतिरिक्त जटिलता है. रूसी तेल खरीदने पर ब्रिक्स देशों पर भारी टैरिफ लगाने की ट्रंप कीधमकी भी गंभीर चिंता का विषय है. माना जा रहा है कि ट्रंप प्रशासन भारत पर विशिष्ट खरीदारी और निवेश की प्रतिबद्धता जताने का दबाव बना रहाहै जैसा उसने यूरोपीय संघ और जापान से कराया था. यह भारत के लिए कोई बड़ा मुद्दा नहीं हो सकता है. क्योंकि ट्रंप बिना किसी निश्चित समयसीमाके बड़ी निवेश प्रतिबद्धता के जरिये राजनीतिक लाभ उठाने के इच्छुक हो सकते हैं.

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