
दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता ने किया पुस्तक का विमोचन, युवाओं से स्वतंत्रता सेनानियों के जीवन और बलिदान को पढ़ने की अपील
नई दिल्ली, 5 नवंबर 2026।
दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता ने क्रांतिकारी भाई परमानंद की 150वीं जयंती के अवसर पर उनकी आत्मकथा ‘मेरी आपबीती: कालापानी की कारावास कहानी’ का नया संस्करण जारी किया। यह पुस्तक लंबे समय से उपलब्ध नहीं थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘मन की बात’ कार्यक्रम में इसका जिक्र किए जाने के बाद इसे दोबारा प्रकाशित किया गया है।
स्वतंत्रता संग्राम की याद दिलाती है पुस्तक
पुस्तक के विमोचन के दौरान विजेन्द्र गुप्ता ने कहा कि भाई परमानंद की आत्मकथा केवल जेल में बिताए गए समय की कहानी नहीं है, बल्कि यह देश के लिए उनके त्याग, साहस और देशभक्ति को भी दर्शाती है। उन्होंने कहा कि युवाओं को ऐसे क्रांतिकारियों के जीवन के बारे में जरूर पढ़ना चाहिए, जिन्होंने देश की आजादी के लिए कई कठिनाइयों का सामना किया।
पांच साल तक सेल्युलर जेल में रहे भाई परमानंद
भाई परमानंद का जन्म वर्ष 1876 में तत्कालीन झेलम जिले में हुआ था। वह गदर पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल थे और आर्य समाज के प्रमुख नेताओं में भी उनकी पहचान थी। वर्ष 1915 के लाहौर षड्यंत्र केस में उन्हें मृत्युदंड सुनाया गया था, जिसे बाद में आजीवन कारावास में बदल दिया गया। इसके बाद उन्हें अंडमान की सेल्युलर जेल भेज दिया गया, जहां उन्होंने करीब पांच साल बिताए।
भगत सिंह और सुखदेव को भी पढ़ाया था
जेल से रिहा होने के बाद भाई परमानंद ने लाहौर के नेशनल कॉलेज में इतिहास पढ़ाया था। भगत सिंह और सुखदेव भी उनके विद्यार्थियों में शामिल थे। महात्मा गांधी ने भी वर्ष 1919 में अपने समाचार पत्र ‘यंग इंडिया’ में उनके साथ हुए व्यवहार की निंदा की थी और उनकी रिहाई की मांग की थी।
प्रधानमंत्री मोदी के उल्लेख के बाद दोबारा प्रकाशित हुई पुस्तक
यह आत्मकथा कई वर्षों से बाजार में उपलब्ध नहीं थी। दिल्ली के अनन्या प्रकाशन ने इसका नया संस्करण प्रकाशित किया है। प्रकाशक अतुल माहेश्वरी ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 अक्टूबर 2026 को ‘मन की बात’ के 139वें एपिसोड में इस पुस्तक का उल्लेख किया था। इसके बाद पुस्तक को दोबारा प्रकाशित करने की प्रेरणा मिली।
युवाओं तक पहुंचना चाहिए क्रांतिकारियों का इतिहास
विजेन्द्र गुप्ता ने कहा कि देश के स्वतंत्रता संग्राम को समझने के लिए क्रांतिकारियों के जीवन और उनके व्यक्तिगत अनुभवों को जानना जरूरी है। उन्होंने युवाओं से भाई परमानंद जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की पुस्तकों को पढ़ने की अपील की, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके योगदान और संघर्ष को याद रख सकें।