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न्यू इंडिया फ़ाउंडेशन की अनुवाद फ़ेलोशिप 2026 चार महत्वपूर्ण भारतीय रचनाओं का होगा अंग्रेज़ी में अनुवाद

भारतीय भाषाओं की महत्वपूर्ण किताबों को दुनिया तक पहुंचाने की नई पहल नई दिल्ली, 7 जुलाई 2026। न्यू इंडिया फ़ाउंडेशन (एनआईएफ़) ने वर्ष 2026 के लिए अपनी प्रतिष्ठित अनुवाद फ़ेलोशिप के तीसरे चरण के विजेताओं की घोषणा कर दी है। इस बार चार अनुवादकों का चयन किया गया है, जो भारतीय भाषाओं की महत्वपूर्ण कथेतर (नॉन-फिक्शन) पुस्तकों का अंग्रेज़ी में अनुवाद करेंगे। इन पुस्तकों में आत्मकथा, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत और राजनीतिक पत्रकारिता जैसी महत्वपूर्ण विधाएं शामिल हैं। इस वर्ष जिन चार अनुवादकों को फ़ेलोशिप मिली है, उनमें जयश्री कलतिल, मिनी चंद्रन, मुरली रंगनाथन और शेफाली झा शामिल हैं। इन सभी का चयन एक लंबी और कड़ी प्रक्रिया के बाद किया गया है। फ़ाउंडेशन का उद्देश्य है कि भारतीय भाषाओं में लिखी गई महत्वपूर्ण किताबें केवल सीमित पाठकों तक ही न रहें, बल्कि उनका अंग्रेज़ी में अनुवाद होकर देश और दुनिया के बड़े पाठक वर्ग तक पहुंच सके। जयश्री कलतिल करेंगी आदिवासी संघर्ष की महत्वपूर्ण आत्मकथा का अनुवाद इस वर्ष फ़ेलोशिप पाने वाली पहली अनुवादक जयश्री कलतिल हैं। उन्हें आदिवासी भूमि अधिकारों की प्रमुख कार्यकर्ता सी.के. जानू की आत्मकथा ‘आडिममक्का’ का अंग्रेज़ी में अनुवाद करने के लिए चुना गया है। यह पुस्तक केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि केरल के आदिवासी समाज के लंबे संघर्ष का दस्तावेज़ मानी जाती है। इसमें बताया गया है कि आदिवासी समुदाय ने अपनी जमीन, अधिकार और सम्मान के लिए किस तरह संघर्ष किया। पुस्तक यह भी दिखाती है कि केरल के विकास मॉडल की चर्चा तो बहुत होती है, लेकिन आदिवासी समाज के संघर्षों का उल्लेख अक्सर नहीं किया जाता। जयश्री कलतिल एक प्रसिद्ध लेखिका और अनुवादक हैं। वह द बॉम्बे लिटरेरी मैगज़ीन में अनूदित साहित्य की मैनेजिंग एडिटर हैं और नए अनुवादकों को प्रशिक्षण देने का भी काम करती हैं। उनके अनुभव को देखते हुए उम्मीद की जा रही है कि यह महत्वपूर्ण पुस्तक अंग्रेज़ी पाठकों तक प्रभावी रूप से पहुंचेगी। मिनी चंद्रन करेंगी मशहूर नाटककार तोप्पिल भासी के संस्मरणों का अनुवाद दूसरी फ़ेलोशिप मिनी चंद्रन को मिली है। वह आईआईटी कानपुर में अंग्रेज़ी की प्रोफ़ेसर हैं। उन्हें प्रसिद्ध मलयालम नाटककार तोप्पिल भासी की संस्मरण पुस्तक ‘ओलीविले ओरमगल’ का अंग्रेज़ी में अनुवाद करने की जिम्मेदारी दी गई है। तोप्पिल भासी भारतीय रंगमंच के बड़े नामों में गिने जाते हैं। उनका प्रसिद्ध नाटक ‘निंगलन्ने कम्युनिस्टाक्की’ आज भी मलयालम साहित्य और रंगमंच की महत्वपूर्ण रचनाओं में शामिल है। उनकी यह संस्मरण पुस्तक 1948 से 1953 के बीच के पांच वर्षों की घटनाओं पर आधारित है। हालांकि इसमें केवल पांच वर्षों का वर्णन है, लेकिन इसे मलयालम की सबसे महत्वपूर्ण आत्मकथात्मक पुस्तकों में गिना जाता है। यह पुस्तक उस समय के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक माहौल को समझने में बहुत मदद करती है। मुरली रंगनाथन करेंगे राहुल सांकृत्यायन की ऐतिहासिक यात्रा का अनुवाद इस वर्ष हिंदी भाषा की ओर से मुरली रंगनाथन का चयन किया गया है। उन्हें प्रसिद्ध लेखक और इतिहासकार राहुल सांकृत्यायन की चर्चित पुस्तक ‘तिब्बत में सवा वर्ष’ का अंग्रेज़ी में अनुवाद करने के लिए फ़ेलोशिप दी गई है। यह पुस्तक पहली बार वर्ष 1934 में प्रकाशित हुई थी। इसमें राहुल सांकृत्यायन ने दिसंबर 1928 से जून 1930 के बीच की अपनी तिब्बत यात्रा का विस्तृत वर्णन किया है। उन्होंने बुद्ध से जुड़े प्राचीन ग्रंथों और ऐतिहासिक जानकारियों की खोज के लिए कठिन यात्राएं की थीं। उस समय भारत, नेपाल और तिब्बत में विदेशियों के प्रवेश पर कई तरह की पाबंदियां थीं। इसके बावजूद राहुल सांकृत्यायन ने जोखिम उठाकर यात्रा की और वहां के समाज, संस्कृति, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को बहुत करीब से समझा। उन्होंने नेपाल, तिब्बत और चीन के बीच के संबंधों का भी विस्तार से वर्णन किया। यही कारण है कि यह पुस्तक भारतीय यात्रा साहित्य और इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तकों में गिनी जाती है। शेफाली झा करेंगी उर्दू की महत्वपूर्ण राजनीतिक पुस्तक का अनुवाद चौथी फ़ेलोशिप शेफाली झा को दी गई है। वह एक प्रसिद्ध एंथ्रोपोलॉजिस्ट और शोधकर्ता हैं। उन्हें उर्दू लेखक इब्राहिम हुसैन जलीस की पुस्तक ‘दो मुल्क, एक कहानी’ का अंग्रेज़ी में अनुवाद करने की जिम्मेदारी मिली है। यह पुस्तक भारत की आज़ादी के बाद के समय की राजनीतिक परिस्थितियों को बहुत करीब से दिखाती है। इसमें लेखक ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर उस दौर की घटनाओं का वर्णन किया है। पुस्तक में विशेष रूप से हैदराबाद रियासत के अंतिम वर्षों, वहां की राजनीति, निज़ाम शासन, इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन की गतिविधियों और रियासत के भारत में विलय की घटनाओं का विस्तार से वर्णन किया गया है। इतिहास और राजनीति को समझने वाले पाठकों के लिए यह पुस्तक एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ मानी जाती है। नीरजा गोपाल जयाल ने फ़ेलोशिप को बताया महत्वपूर्ण पहलन्यू इंडिया फ़ाउंडेशन की गवर्निंग बोर्ड सदस्य नीरजा गोपाल जयाल ने कहा कि इस वर्ष चुने गए सभी अनुवादक अपने-अपने क्षेत्र के उत्कृष्ट विद्वान हैं। उन्होंने कहा कि जिन पुस्तकों का चयन किया गया है, वे भारत के सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक इतिहास को समझने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने कहा कि आत्मकथा, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत और राजनीतिक पत्रकारिता जैसी विधाओं की ये पुस्तकें भारत को अलग दृष्टि से देखने और समझने का अवसर देती हैं। हर फ़ेलो को मिलेगा छह लाख रुपये का अनुदानन्यू इंडिया फ़ाउंडेशन की इस फ़ेलोशिप के तहत प्रत्येक चयनित अनुवादक को छह महीने के लिए छह लाख रुपये का अनुदान दिया जाएगा। इस सहायता राशि का उद्देश्य यह है कि अनुवादक बिना आर्थिक चिंता के पूरी गंभीरता और गुणवत्ता के साथ अपना अनुवाद कार्य पूरा कर सकें। फ़ेलोशिप के अंतर्गत असमिया, बांग्ला, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, मराठी, मलयालम, ओड़िया, तमिल और उर्दू जैसी भारतीय भाषाओं की महत्वपूर्ण कथेतर पुस्तकों का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया जाता है। चयन प्रक्रिया रही पूरी तरह निष्पक्ष और विशेषज्ञों की देखरेख में हुईइस वर्ष फ़ेलोशिप के लिए देशभर से कई आवेदन प्राप्त हुए थे। सभी आवेदनों का मूल्यांकन विशेषज्ञ समितियों ने किया। हर भाषा के लिए अलग-अलग भाषा विशेषज्ञ समिति बनाई गई थी। इन समितियों में अनुभवी प्रोफ़ेसर, साहित्यकार, द्विभाषी विद्वान और अनुवादक शामिल थे। इनके सुझावों और विस्तृत मूल्यांकन के बाद अंतिम चार नामों का चयन किया गया। श्रीनाथ राघवन ने बताया अनुवाद क्यों है जरूरीन्यू इंडिया फ़ाउंडेशन के गवर्निंग बोर्ड सदस्य श्रीनाथ राघवन ने कहा कि भारत की कई महत्वपूर्ण किताबें भारतीय