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“PM मोदी के दौरे से पहले स्टालिन का वार!” केंद्र पर लगाया विश्वासघात का आरोप, पूछे शिक्षा और फंड से जुड़े तीखे सवाल

प्रधानमंत्री मोदी के तमिलनाडु दौरे से ठीक पहले राज्य के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। स्टालिन ने भाजपा नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर तमिलनाडु के साथ बार-बार विश्वासघात करने और राज्य की प्रमुख मांगों को लगातार नजरअंदाज करने का आरोप लगाया। मुख्यमंत्री स्टालिन ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक लंबी पोस्ट के जरिए केंद्र सरकार से कई सवाल पूछे। उन्होंने शिक्षा, परिसीमन, राज्यपाल की भूमिका, तमिल भाषा के लिए वित्तीय सहायता, कल्याणकारी योजनाओं, बुनियादी ढांचे और स्वास्थ्य परियोजनाओं में देरी जैसे मुद्दों को उठाया। महत्वपूर्ण परियोजनाओं को लंबे समय से लंबित रखास्टालिन ने पूछा कि तमिलनाडु के लिए लंबित 3,458 करोड़ रुपये की समग्र शिक्षा योजना की राशि कब जारी होगी। उन्होंने परिसीमन को लेकर चिंता जताते हुए सवाल किया कि राज्य की लोकसभा सीटें कम नहीं होंगी, इसकी स्पष्ट गारंटी केंद्र सरकार कब देगी। उन्होंने राज्यपाल की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि राज्य सरकार के कामकाज में लगातार हस्तक्षेप हो रहा है। इसके साथ ही उन्होंने तमिल भाषा के विकास के लिए पर्याप्त वित्तीय सहायता न मिलने का मुद्दा उठाया। मुख्यमंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने राज्य की कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं को लंबे समय से लंबित रखा है। इनमें मदुरै एम्स, होसुर एयरपोर्ट, कोयंबटूर और मदुरै मेट्रो परियोजनाएं शामिल हैं। उन्होंने आपदा राहत फंड, कीझड़ी रिपोर्ट जारी करने और नीट से छूट की मांग पर भी केंद्र को घेरा। शिक्षा फंड और नीट जैसे मुद्दों पर केंद्र को घेरास्टालिन ने कहा कि तमिलनाडु के लोग राज्य की उपेक्षा करने वाले भाजपा गठबंधन को चुनाव में जवाब देंगे। उन्होंने दावा किया कि राज्य की जनता केंद्र की नीतियों से नाराज है और आने वाले विधानसभा चुनावों में इसका असर साफ दिखाई देगा। इस बीच प्रधानमंत्री मोदी आज तमिलनाडु के चेंगलपट्टू जिले के मदुरंथकम में जनसभा को संबोधित करेंगे। यह जनसभा आगामी विधानसभा चुनावों से पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के लिए चुनावी अभियान की शुरुआत के तौर पर देखी जा रही है। मोदी के तमिलनाडु दौरे से पहले मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने केंद्र सरकार पर राज्य की मांगों की अनदेखी, फंड में देरी और परियोजनाओं को लंबित रखने का आरोप लगाया। उन्होंने परिसीमन, शिक्षा फंड और नीट जैसे मुद्दों पर केंद्र को घेरा।

“भाजपा में ‘नितिन नवीन’ युग की शुरुआत!” पद संभालते ही अपनों के निशाने पर अध्यक्ष, उम्र और अनुभव पर छिड़ी जंग

भाजपा के नव निर्वाचित अध्यक्ष नितिन नवीन ने जिम्मेदारी संभाल ली है। पद ग्रहण करने से पहले उन्होंने सभी बड़े नेताओं का आशीर्वाद लिया। इन सबके बीच उनका कुर्सी संभालना कुछ नेताओं को रास नहीं आया है। इस तरह के नेता नितिन नवीन उम्र और अनुभव को लेकर बातें कर रहे हैं। एक नेता जी नितिन नवीन के बारे में चर्चा पर इतना बिदक गए कि बोले वह क्या कर लेंगे? भाजपा के भीतर एक चर्चा यह भी है कि नितिन नवीन के बहाने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भाजपा अध्यक्ष पद को लेकर चले आ रहे संकट को बड़ी चतुराई से टाल दिया है। हालांकि दूसरे गुट की उम्मीद अभी भी कायम है। बोलते नहीं। बस धीरे से काम कर देतेपश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी 2 फरवरी को राज्य का अंतरिम बजट पेश करेंगी। इस बार के बजट पर चुनावी चुनौतियों को देखकर ममता बनर्जी का खास ध्यान है। वह युवा वर्ग को खास तौर पर ध्यान में रख सकती हैं। हालांकि भाजपा की अग्निमित्रा पॉल कहती हैं कि ममता बनर्जी अब चाहे जो कर लें। इस बार वह बंगाल का मिजाज भांपने में चूक गई हैं। ममता ने इस बार तृणमूल के दूसरे नेताओं को काफी अहम जिम्मेदारी दी है। उन्होंने पार्टी के नेताओं से भी बयान पर नियंत्रण रखने और सोच समझकर बोलने के लिए कहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जदयू के सुप्रीम लीडर हैं, लेकिन अब थोड़ा शांत रहते हैं। केन्द्रीय मंत्री राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह कांटा सहित मछली को निगल जाने की राजनीति में पारंगत माने जाते हैं। वहीं, नीतीश कुमार के दूसरे वफादार भी हैं। कुछ हाशिए पर धकेल दिए हैं। उनमें मुख्य धारा में लौटने की छटपटाहट है। इस छटपटाहट के पीछे आगामी राज्यसभा चुनाव भी है। ऐसे में कई दौर का शीतयुद्ध चल रहा है। आरसीपी सिंह भी पार्टी में आने के लिए बेताब हैं। श्याम रजक ने यह कहकर मुश्किलें पैदा कर दी हैं कि आरसीपी पार्टी से गए ही कब थे? इधर दिल्ली में ललन सिंह की टीम ने केसी त्यागी का पत्ता काटने की कोशिश की है। हालांकि नीतीश कुमार राजनीति के चतुर खिलाड़ी हैं। बोलते नहीं। बस धीरे से काम कर देते हैं। ऐसे में सब समय की धार देख रहे हैं। रणनीतिकारों को हैरत में डाल दियाअसम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने केन्द्रीय भाजपा को भरोसा दिया है कि राज्य में पार्टी की 80 से अधिक सीटें आएंगी। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा और भंवर जितेन्द्र सिंह की टीम इस बार बड़े दावे कर रही है। कांग्रेस के सांसद गौरव गगोई को कोच-राजबोंगशी, ताई-अहोम, चुटिया, मटक, मोरान और चाय जनतजातियों की नाराजगी से काफी उम्मीदें हैं। तृणमूल की एक राज्यसभा सांसद का कहना है कि सीएए-एनआरसी को लेकर जनता के एक बड़े वर्ग में बड़ी नाराजगी है। इन सबके बीच भाजपा के ही एक नेता ने अपनी पार्टी के रणनीतिकारों को हैरत में डाल दिया। उन्होंने साफ कहा कि बिस्वा सरमा जितने अच्छे नेता हैं, उससे बड़े शो-मैन। इसलिए सावधानी हटी तो दुर्घटना हटी।

“ट्रंप से दोस्ती, घर में फजीहत!” ‘शांति बोर्ड’ पर हस्ताक्षर कर बुरे फंसे शहबाज शरीफ, पाकिस्तान में भारी बवाल

अमेरिका के साथ गलबहियां करने के चक्कर में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ अपने ही घर में सवालों के बीच घिर गए हैं। उन्हें विपक्ष की कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड की अध्यक्षता में बने शांति बोर्ड में शामिल होने के लिए शरीफ ने शरीफ ने गुरुवार को हस्ताक्षर किए। पाकिस्तान समेत 19 देशों के नेताओं ने दावोस में इस समूह के चार्टर के रूप में अपना-अपना नाम दर्ज कराया। इस दौरान जब शहबाज का हस्ताक्षर करने का वक्त आया तो वह ट्रंप के बगल में बैठक मुस्कुराते नजर आए। हालांकि, इस फैसले ने पाकिस्तान के अंदर बवाल मचा दिया। आइए पहले जानते हैं कि यह शांति बोर्ड क्यों बनाया गया है और इसको बनाने का विचार कहां से आया है। शांति बोर्ड बनाने का विचार सबसे पहले गाजा युद्ध के दौरान आया, जब अमेरिकी ने अपनी शांति योजना को पेश किया। यह बोर्ड गाजा में शांति की निगरानी करने के लिए बनाया गया। लेकिन यह बोर्ड अंतरराष्ट्रीय संघर्षों के समाधान के लिए एक मध्यस्थ की भूमिका की दिशा में आगे बढ़ता दिख रहा है। बताया जा रहा है कि ट्रंप इसके माध्यम से अपना खुद का संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) बना रहे हैं। धारणा बने कि पाकिस्तान में लोकतंत्रविपक्षी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) पार्टी के अध्यक्ष गोहर अली खान ने इस फैसले पर अफसोस जताया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री शरीफ ने किसी परामर्श के शांति बोर्ड में शामिल होने का फैसला किया। उन्होंने कहा, कल विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह शांति बोर्ड में शामिल हो गया है। सरकार ने संसद को नजरअंदाज किया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि शांति बोर्ड में शामिल होने से पहले उसकी शर्तों के बारे में संसद को बताया जाना चाहिए था। उन्होंने कहा, क्या आप हमास को निरस्त्र करने में भूमिका निभाएंगे? अगर यह संयुक्त राष्ट्र (यूएन) का कोई निकाय होता, तो सरकार खुद से कदम उठा सकती थी। लेकिन शांति बोर्ड कोई यूएन का निकाय नहीं है। पाकिस्तान के प्रमुख अखबार डॉन की खबर के मुताबिक, पीटीआई के वरिष्ठ नेता असद कैसर ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार ने इतने संवेदनशील मुद्दे पर सर्वसम्मति से फैसला लेने की जहमत नहीं उठाई। उन्हें इस पर संसद में चर्चा करना चाहिए थी, ताकि विश्व समुदाय में यह धारणा बने कि पाकिस्तान में लोकतंत्र है। शांति की उम्मीद करना बेवकूफों की जन्नतजमीयत उलेमा-ए-इस्लाम फजल (जेयूआई-एफ) के प्रमुख फजलुर रहमान ने भी इस फैसले की कड़ी आलोचना की। उन्होंने हमास को निरस्त्र करने के किसी भी अभियान का हिस्सा बनने के खिलाफ चेतावनी दी। पाकिस्तान की संसद में रहमान ने कहा कि फलस्तीनियों की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार लोग शांति बोर्ड का हिस्सा हैं।उन्होंने कहा कि ट्रंप से शांति की उम्मीद करना बेवकूफों की जन्नत (स्वर्ग) में रहने जैसा है। फजलुर रहमान ने इस बात पर जोर दिया कि ट्रंप ही बोर्ड के अध्यक्ष हैं और उन्होंने अपनी इच्छा से सदस्यों को चुना है।