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सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने ‘भारत-श्रीलंका’ पर अपने विचार साझा किए हैं। कोलंबो विश्वविद्यालय के लॉ फैकल्टी में ‘भारत-श्रीलंका नीति संवाद: पर्यावरणीय स्थिरता और क्षेत्रीय सहयोग को आगे बढ़ाना’ विषय पर एक गोष्ठी में न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, ‘बंगाल की खाड़ीहमें विभाजित नहीं करती, बल्कि एक साझा पारिस्थितिक भाग्य के माध्यम से दोनों देशों को बांधती है।’

आपदा प्रबंधन में सहयोग को बढ़ावा देती
लॉ फैकल्टी के कार्यक्रम में न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि भारत और श्रीलंका के बीच पर्यावरण सहयोग कोई दान या कूटनीति का विषयनहीं है, बल्कि यह अस्तित्व का सवाल है। उन्होंने कहा कि पाल्क खाड़ी और मन्नार की खाड़ी जैव विविधता के प्रमुख स्थान हैं, जहां प्रवाल भित्तियां, सीग्रास (समुद्री घास) मैदानी क्षेत्र और कई संकटग्रस्त प्रजातियां पाई जाती हैं। लेकिन अधिक मछली पकड़ने, विनाशकारी ट्रॉलिंग प्रथाओं औरअनियंत्रित तटीय निर्माण के कारण इन क्षेत्रों का पारिस्थितिक संतुलन गंभीर संकट में हैं। उन्होंने बताया कि 2004 की सुनामी से लेकर बार-बार आनेवाले चक्रवातों तक, दोनों देशों ने अनुभव किया है कि कैसे पर्यावरणीय आपदाएं राजनीतिक सीमाओं को पार कर जाती हैं। न्यायमूर्ति कांत ने कहा, ‘ये ऐसी घटनाएं हैं जो राष्ट्रीय सीमाओं को नहीं पहचानतीं और आपदा प्रबंधन में सहयोग को बढ़ावा देती हैं, फिर भी पारिस्थितिक बहाली अभी भीखंडित बनी हुई है।’

मॉडल’ को अपनाने की जरूरत
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि भारत और श्रीलंका की न्यायपालिका को अब एक ‘क्षेत्रीय पर्यावरणीय संवैधानिक मॉडल’ को अपनाने की जरूरत है, क्योंकि कई पर्यावरणीय अधिकार और दायित्व सीमाओं से परे हैं। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि दोनों देशों को साझा भौगोलिक जिम्मेदारी निभानीहोगी क्योंकि पर्यावरणीय क्षति की रफ्तार तेज हो रही है। तेल रिसाव, प्रवाल भित्तियों का सफेद होना और मत्स्य समुदायों की आजीविका पर प्रभावजैसे मुद्दे अब दोनों देशों के साझा संकट बन गए हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि जलवायु परिवर्तन और समुद्र स्तर में वृद्धि से तमिलनाडु और उत्तरी श्रीलंकाके तटीय इलाकों में कृषि और मत्स्य उद्योग प्रभावित हो रहे हैं। नमकीन पानी की घुसपैठ और अनिश्चित मानसून ने स्थिति को और खराब कर दिया है।उन्होंने साथ ही उन समस्याओं से निपटने के लिए संयुक्त निगरानी और डेटा साझा करने की आवश्यकता पर जोर दिया जो बिखरी हुई हैं और जिन परनजर नहीं रखी जा रही है।

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