सुप्रीम कोर्ट में हाल ही में वक्फ (संशोधन) अधिनियम के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई हुई। इस दौरान मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने एकमहत्वपूर्ण बयान दिया। उन्होंने कहा कि संसद द्वारा पारित कानूनों को तब तक संवैधानिक माना जाता है जब तक उनमें कोई स्पष्ट और गंभीरसंवैधानिक त्रुटि न हो।
केंद्र सरकार की दलील और वरिष्ठ वकीलों का विरोध
सरकार ने अदालत से अनुरोध किया कि वक्फ अधिनियम की वैधता पर विचार करते समय सुनवाई को कुछ विशिष्ट बिंदुओं तक सीमित रखा जाए।हालांकि, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने इसका विरोध किया। उनका तर्क था कि किसी महत्वपूर्ण कानून की समीक्षाको कुछ हिस्सों तक सीमित नहीं किया जा सकता।
कानून के उद्देश्य पर सवाल
कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि यह संशोधन वक्फ संपत्तियों पर नियंत्रण करने के उद्देश्य से लाया गया है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि संसदद्वारा पारित कानूनों में संवैधानिकता की संभावना होती है और न्यायपालिका को बिना ठोस आधार के हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
धार्मिक स्थलों और चढ़ावे पर चर्चा
बातचीत के दौरान, मुख्य न्यायाधीश ने विभिन्न धार्मिक स्थलों में चढ़ावे की तुलना की। उन्होंने कहा कि सभी धार्मिक स्थलों में चढ़ावा आता है, लेकिन सिब्बल ने स्पष्ट किया कि मस्जिदों में चढ़ावे की परंपरा अलग होती है।
पंजीकरण और एएसआई संरक्षित संपत्तियों पर बहस
मुख्य न्यायाधीश ने पुराने कानूनों में वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण की अनिवार्यता के बारे में पूछा। सिब्बल ने बताया कि 1954 के बाद के संशोधनोंमें पंजीकरण अनिवार्य किया गया था। इसके अलावा, एएसआई संरक्षित संपत्तियों के बारे में चर्चा हुई कि क्या वे वक्फ मानी जाएंगी या नहीं।
धार्मिक अधिकारों पर प्रभाव
अदालत ने यह भी विचार किया कि क्या यह कानून व्यक्ति के धार्मिक पालन के अधिकार को प्रभावित करता है। सिब्बल ने तर्क दिया कि यदि कोईसंपत्ति वक्फ से बाहर हो जाती है, तो वह धार्मिक स्थान नहीं मानी जाएगी, जो धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।