
देहरादून में त्रिपुरा के 24 साल एक छात्र एंजेल चकमा की मौत का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को एक पीआईएलदायर की गई है, जिसमें पूर्वोत्तर राज्यों और दूसरे सीमावर्ती इलाकों के नागरिकों के खिलाफ नस्लीय भेदभाव और हिंसा को रोकने की मांग की गई है।इसके साथ ही याचिका में लगातार हो रही संवैधानिक नाकामी को दूर करने के लिए न्यायिक दखल की भी अपील की गई है। बता दें कि एंजेलचकमा की 27 दिसंबर को देहरादून के सेलाकुई इलाके में नस्लीय हमले में लगी गंभीर चोटों के कारण मौत हो गई थी। याचिका के अनुसार, त्रिपुरा केउनाकोटी जिले के मछमारा निवासी 24 वर्षीय एंजेल चकमा 27 दिसंबर को देहरादून के सेलाकुई इलाके में हुए एक नस्लीय हमले में गंभीर रूप सेघायल हो गए थे। इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। वह एमबीए की पढ़ाई के लिए देहरादून आए थे और घटना के वक्त अपने छोटे भाई माइकलके साथ थे।
दिशा-निर्देश बनाने की मांग की गई
एंजेल चकमा के परिवार ने सभी आरोपियों के लिए फांसी या कम से कम आजीवन कारावास की मांग की है। परिवार का कहना है कि यह हमलाअचानक नहीं था, बल्कि नस्लीय नफरत से प्रेरित था। घटना के दौरान दोनों भाइयों पर हमला किया गया और एंजेल के गले और रीढ़ की हड्डी में गंभीरचोटें आईं। दिल्ली के वकील अनूप प्रकाश अवस्थी द्वारा दायर पीआईएल में केंद्र सरकार के साथ-साथ सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों कोपक्षकार बनाया गया है। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के उल्लंघन का हवाला देते हुए नस्लीय हिंसा को रोकने के लिए स्पष्टदिशा-निर्देश बनाने की मांग की गई है। इसमें ‘रेशियल स्लर’ को अलग श्रेणी का घृणा अपराध मानने और उसके लिए सजा तय करने की भी अपीलकी गई है।
दोषियों को सख्त सजा नहीं मिल पाती
पीआईएल में केंद्र और राज्यों से नस्लीय अपराधों के लिए एक स्थायी नोडल एजेंसी या आयोग बनाने की मांग की गई है। साथ ही हर जिले औरमहानगर में विशेष पुलिस इकाई गठित करने का सुझाव दिया गया है, ताकि ऐसे मामलों की तुरंत शिकायत दर्ज हो और कार्रवाई हो सके। याचिका मेंकहा गया है कि एंजेल चकमा की हत्या कोई अकेली घटना नहीं है। इसमें 2014 में नीदो तानियाम की मौत और महानगरों में पूर्वोत्तर के छात्रों वकामगारों पर हुए हमलों का भी उल्लेख किया गया है। याचिका के मुताबिक, नस्लीय मंशा को जांच के शुरुआती चरण में दर्ज न करने से ऐसे अपराधसामान्य मामलों में बदल जाते हैं और दोषियों को सख्त सजा नहीं मिल पाती।